Pre-cyclone drills conducted for April-June 2024 season

भारत AI टूल्स से करता है चक्रवात, भूस्खलन, बाढ़ की निगरानी

एक सरकारी रिपोर्ट में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया गया है कि भारत चक्रवात, भूस्खलन, बाढ़ और ग्लेशियर की निगरानी AI टूल्स से करता है। भारत में विकसित स्वदेशी एआई-आधारित भूस्खलन चेतावनी प्रणाली अब पहाड़ खिसकने से तीन घंटे पहले ही अलर्ट दे देती है।

यह सिस्टम कम लागत वाले सेंसरों का उपयोग करता है जो मिट्टी की नमी, बारिश, नमी, तापमान और जमीन की हलचल को मापते हैं। यह सारा डेटा एक मशीन लर्निंग मॉडल को भेजा जाता है, जिसकी सटीकता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। हिमाचल प्रदेश में 60 से अधिक स्थानों पर इसे लगाया गया है, जो जमीन में होने वाली मिलीमीटर जितनी छोटी हलचल को भी पहचान लेता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामान से बना यह सिस्टम विदेशी तकनीक के मुकाबले बेहद सस्ता है और आपदा से निपटने में भारत की तैयारी को मजबूत करता है। इसकी मदद से भूस्खलन वाले इलाकों में समय रहते लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है।

इसरो द्वारा वित्तपोषित (2021-24) इंडियन लैंड डेटा एसिमिलेशन सिस्टम (आईएलडीएएस), रिमोट सेंसिंग और विशेष कंप्यूटर मॉडल्स की मदद से जमीन की स्थिति और बाढ़ के संभावित इलाकों का सटीक अनुमान लगाता है। गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसे क्षेत्रों में नदियों के बेहतर प्रबंधन के लिए भौतिक विज्ञान और एआई तकनीकों को मिलाकर बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाले सिस्टम बनाए गए हैं। इसी क्रम में, BrahmaSATARK ब्रह्मपुत्र बेसिन के लिए बाढ़ का पूर्वानुमान देता है, जबकि GBM-CLIMPACT एक ऐसा टूलकिट है जो गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना बेसिन में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और जल क्षेत्र की तैयारी का आकलन करता है।

ये सभी एआई आधारित सिस्टम मिलकर खतरे की चेतावनी काफी समय पहले (लीड टाइम) देने में मदद करते हैं, जिससे लोगों को सुरक्षित निकालने की योजना बनाना आसान हो जाता है। इनकी मदद से इमारतों और बिजली-पानी जैसे बुनियादी ढांचे के नुकसान को कम किया जा सकता है और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील इलाकों में रहने वाले समुदायों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

एक सरकारी रिपोर्ट में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया गया है कि भारतीय मौसम विभाग समुद्री तूफानों (चक्रवातों) पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स का इस्तेमाल करता है।

तूफान कितना ताकतवर है, इसका अंदाज़ा लगाने में एडवांस्ड ड्वोरक तकनीक मदद करती है। इसके साथ ही, आईएमडी मौसम की भविष्यवाणी करने वाले यूरोपीय केंद्र (यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्टिंग) से मिलने वाले एआई बेस्ड गाइडेंस का भी उपयोग करता है।

ये सभी आधुनिक तकनीकें यह बताने में मदद करती हैं कि चक्रवात कब बनेगा, किस दिशा में जाएगा और वह कितना शक्तिशाली होगा।

फरवरी 2026 में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा विकसित ट्रांसफॉर्मर-आधारित न्यूरल नेटवर्क मानसून के व्यवहार की 18 दिन पहले ही भविष्यवाणी कर सकते हैं।

रिपोर्ट के महत्वपूर्ण बिंदु इसप्रकार हैं :

दुनिया भर के एआई सिस्टम (जैसे GraphCast, PanguWeather, Aurora और FourCastNet) के तुलनात्मक अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि अब चक्रवात के जमीन से टकराने के 96 घंटे पहले ही उसके रास्ते का सटीक पता लगाया जा सकता है।

यह तकनीक कुछ ही सेकंड्स में 200 किलोमीटर के दायरे तक की सटीक जानकारी दे देती है। इन सुधारों की वजह से लोगों को सुरक्षित निकालने की योजना बनाने और बिजली-पानी जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर को बचाने में बहुत मदद मिल रही है।

आईआईटी बॉम्बे ने स्पेशली अवेयर डोमेन एडाप्टेशन नेटवर्क (SpADANet) नाम का एक एआई मॉडल विकसित किया है। यह मॉडल हवाई तस्वीरों के जरिए चक्रवात और तूफानों से हुए नुकसान का सटीक अंदाजा लगाता है।

इस मॉडल ने पुराने तरीकों की तुलना में 5 प्रतिशत बेहतर सटीकता हासिल की है। यह मॉडल कम डेटा होने पर भी सही परिणाम दे सकता है। यह एनडीएमए जैसी आपदा प्रबंधन एजेंसियों की बड़ी समस्याओं, जैसे—डेटा की कमी और कम कंप्यूटर पावर—को हल करता है, जिससे आपदा के समय तेजी से और भरोसेमंद तरीके से मदद पहुंचाई जा सके।

आईआईटी मद्रास भारत में जलवायु की सटीक भविष्यवाणी करने के लिए रिलायबिलिटी एनसेंबल एवरेजिंग (आरईए) तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने 26 अलग-अलग जलवायु मॉडलों को एक साथ मिलाया और हर मॉडल को इस आधार पर नंबर दिए कि वे वर्तमान और भविष्य के मौसम को कितनी सटीकता से बताते हैं। जब भारत के चार शहरों—कोयंबटूर, राजकोट, उदयपुर और सिलीगुड़ी—में इनका परीक्षण किया गया, तो पाया गया कि ज्यादातर मॉडल बारिश की सही भविष्यवाणी करने में पीछे रह गए। लेकिन, आरईए तकनीक बहुत ही भरोसेमंद नतीजे देती है, जिससे मानसून वाले इलाकों में भविष्य की योजनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे में एक वर्चुअल सेंटर बनाया गया है, जो एआई आधारित एप्लिकेशन टूल्स विकसित करता है।

भारतीय मौसम विभाग ने एआई और मशीन लर्निंग रिसर्च को मजबूत करने के लिए एक विशेष टीम तैयार की है। इसके साथ ही, आईएमडी ने एआई रिसर्च में सहयोग के लिए आईआईटी, एनआईटी, इसरो, डीआरडीओ और अन्य बड़े संस्थानों के साथ समझौते किए हैं। वैज्ञानिकों को वर्कशॉप और कोर्सेज के माध्यम से एआई की ट्रेनिंग दी जा रही है। आईएमडी हर साल मई के महीने में एआई और मशीन लर्निंग के बुनियादी सिद्धांतों पर एक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी आयोजित करता है।