नई दिल्ली, 14 मार्च। भारत में डिजिटल सेवाओं, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग के कारण डेटा सेंटर उद्योग तेजी से फैल रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में डेटा सेंटरों की कुल क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो बढ़कर 2025 तक लगभग 1500 मेगावाट हो गई है। यानी पाँच साल में यह क्षमता लगभग चार गुना बढ़ गई है।
सरकार का कहना है कि एआई तकनीक के विकास को बढ़ावा देने के लिए एआई कंप्यूट क्षमता ढांचा तैयार किया गया है। इसके तहत 14 सेवा प्रदाताओं और डेटा सेंटरों के माध्यम से लगभग 38,231 GPU (ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट) उपलब्ध कराए गए हैं। ये GPU स्टार्टअप, शोधकर्ताओं, विश्वविद्यालयों और अन्य योग्य उपयोगकर्ताओं को लगभग 65 रुपये प्रति घंटे की रियायती दर पर दिए जा रहे हैं। यह दर अंतरराष्ट्रीय स्तर की औसत लागत से लगभग तीन गुना कम बताई जा रही है।
देश में ज्यादातर बड़े डेटा सेंटर मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, नोएडा और जामनगर जैसे शहरों में स्थापित हैं।
डेटा सेंटर से कितनी बढ़ेगी बिजली की खपत
डेटा सेंटर 24 घंटे चलने वाले अत्यधिक ऊर्जा-उपयोगी ढांचे होते हैं। इनमें हजारों सर्वर और एआई प्रोसेसर लगातार काम करते हैं, जिन्हें ठंडा रखने के लिए भी बड़ी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है।
विद्युत मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, भारत में डेटा सेंटरों से बिजली की मांग 2031-32 तक लगभग 13.56 गीगावॉट तक पहुँच सकती है।
इसे समझने के लिए कुछ सरल तुलना देखें:
13.56 गीगावॉट बिजली लगभग 1.3–1.5 करोड़ घरों की बिजली खपत के बराबर हो सकती है।
अभी भारत के डेटा सेंटर लगभग 1.5 गीगावॉट क्षमता पर काम कर रहे हैं, इसलिए आने वाले वर्षों में यह मांग करीब 9 गुना तक बढ़ सकती है।
भारत की कुल बिजली क्षमता कितनी है
भारत दुनिया के बड़े बिजली उत्पादक देशों में शामिल है।
वर्तमान में देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 430–440 गीगावॉट के आसपास मानी जाती है। इसमें शामिल हैं:
- कोयला आधारित बिजली
- जल विद्यु
- गैस आधारित बिजली
- परमाणु ऊर्जा
- सौर और पवन ऊर्जा
यदि डेटा सेंटरों की अनुमानित मांग 13.56 गीगावॉट तक पहुँचती है, तो यह भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता का लगभग 3 प्रतिशत से थोड़ा अधिक ही होगा। इसलिए सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय बिजली व्यवस्था इस अतिरिक्त मांग को संभालने में सक्षम है।
बिजली आपूर्ति के लिए सरकार की तैयारी
सरकार का कहना है कि बढ़ती मांग को देखते हुए राष्ट्रीय ट्रांसमिशन नेटवर्क (बिजली पारेषण व्यवस्था) का लगातार विस्तार किया जा रहा है ताकि देश के सभी क्षेत्रों में विश्वसनीय बिजली उपलब्ध हो सके।
इसके साथ ही हाल ही में संसद ने सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) अधिनियम पारित किया है। इस कानून का उद्देश्य भविष्य में छोटे मॉड्यूलर और माइक्रो परमाणु रिएक्टरों के उपयोग को बढ़ावा देना है, जिससे डेटा सेंटर और एआई जैसे क्षेत्रों को स्थिर और लगातार बिजली मिल सके।
पानी की खपत का मुद्दा
डेटा सेंटरों में सर्वरों को ठंडा रखने के लिए पानी का उपयोग भी किया जाता है। यह मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि किस प्रकार की कूलिंग तकनीक अपनाई गई है।
पानी के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने भूजल उपयोग के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं। साथ ही डेटा सेंटर उद्योग अब नई तकनीकों का उपयोग कर रहा है, जैसे :
- डायरेक्ट-टू-चिप
- लिक्विड कूलिंग
- एडियाबेटिक कूलिंग
- इमर्शन कूलिंग
इन तकनीकों से बिजली और पानी दोनों की खपत कम करने की कोशिश की जा रही है।
सरकार के अनुसार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों की संख्या बढ़ना तय है। इसलिए बिजली, पानी और बुनियादी ढांचे की योजना पहले से बनाकर इस क्षेत्र के विकास को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
यह जानकारी केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने 13 मार्च 2026 को राज्यसभा में दी।
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