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राज्यपाल संवाद द्वारा राज्य के विकास को नए आयाम दें

नई दिल्ली, 12 अक्टूबर (जनसमा)।  कठिन और दूरगामी लक्ष्यों को प्राप्त करने में संवाद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अपने राज्यों में विधायिका का अहम अंग होने के नाते विधायकों के साथ संवाद स्थापित करके आप अपने राज्य के विकास को नए आयाम दे सकते हैं।

राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द ने यह बात राज्यपाल सम्मेलन-2017 के अपने आरम्भिक उद्बोधन में कही।

राज्यपालों एवं उप राज्यपालों के 48वें सम्मेलन में उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि राजभवन में उन्हें वर्ष में कम से कम एक बार बुलाकर विस्तृत संवाद करना चाहिए। इसी प्रकार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के साथ भी समय-समय पर संवाद होना चाहिए। विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों तथा जागरूक नागरिकों से संवाद बना कर आप समाज और राज्य सरकार को सही दिशा दे सकते हैं। इस तरह आपके दायित्व बहु-आयामी हैं।

राष्ट्रीय लक्ष्यों को निश्चित समय सीमा में प्राप्त करने के लिए ‘टीम इंडिया’ एक ही दिशा में आगे बढ़े, यह सुनिश्चित करने के लिए राज्यपालों को अपने-अपने राज्यों के स्तर पर सभी स्टेकहोल्डर्स को राष्ट्रीय अभियानों से जोड़ने में सहायता करनी चाहिए।

विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में समय पर कुलपतियों तथा अध्यापकों की नियुक्ति, पाठ्यक्रमों का update होना, शिक्षा के लिए अनुकूल वातावरण, ऑनलाइन एड्मिशन, समय पर परीक्षा एवं परिणाम की घोषणा, तथा समय पर दीक्षांत समारोह का आयोजन, यह अति आवश्यक है। इन सभी विषयों पर ध्यान देकर राज्य के शिक्षण संस्थानों को बेहतर बनाया जा सकता है। इन शिक्षण संस्थानों में खेल-कूद की अच्छी सुविधाएं हो तथा विद्यार्थियों को प्रोत्साहन दिया जाए ताकि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं के लिए विश्व स्तर के खिलाड़ी तैयार हो सकें। मुझे आशा है कि सभी राज्यपाल उच्च शिक्षा के सर्वांगीण सुधार के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करते रहेंगे।

उच्च शिक्षा के लिये भारत में मात्र 24.5% का Gross Enrollment Ratio विकसित देशों की तुलना में लगभग आधा है। इसे बढ़ाने के साथ-साथ शिक्षा के स्तर को ऊंचा करना भी जरूरी है। मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा देश में 20 विश्व-स्तरीय उच्च शिक्षण संस्थानों के निर्माण की योजना है, जिनमें 10 निजी क्षेत्र में होंगे और 10 सरकारी क्षेत्र में। आप सब अपने राज्य में ऐसे संस्थानों के निर्माण के लिये दिशा और प्रेरणा दे सकते हैं।

आज के डिजिटल युग में लोगों की यह अपेक्षा है कि सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराने के तरीके सरल हों, पारदर्शी हों और जवाबदेही के प्रावधान हों, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। हमारे देश के नागरिकों को विकसित देशों में उपलब्ध सार्वजनिक सुविधाओं के समकक्ष सुविधाएं मिलनी चाहिए।

युवाओं को राष्ट्र-निर्माण से जोड़ना अनिवार्य है। समाज में आ रही विकृतियों को दूर करने तथा नैतिक मूल्यों में गिरावट को रोकने की जरूरत है। देश का भविष्य युवा पीढ़ी की योग्यता, नैतिकता और संवेदनशीलता पर निर्भर करता है। वृद्धों की सेवा, स्वच्छता के प्रति आग्रह, पर्यावरण तथा जीव जंतुओं के प्रति सम्मान की भावना, सामाजिक व्यवहार में संवेदनशीलता तथा ईमानदारी के मूल्यों से युक्त नई पीढ़ी अपने ज्ञान और कौशल के बल पर देश को नई ऊँचाइयों तक पहुंचा सकती है। इस संदर्भ में राज्य स्तर पर उच्च शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसीलिए सभी राज्यों में ऐसे शिक्षण संस्थानों की आवश्यकता है जो भावी पीढ़ी का निर्माण करने में समर्थ हों।

अनुमानतः देश के 69% विश्व-विद्यालय राज्य सरकारों की देख-रेख में हैं, जिनमें देश के 94% विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते हैं। ऐसी आम धारणा है कि केंद्र सरकार के संस्थानों और केंद्रीय विश्व-विद्यालयों के समकक्ष लाने के लिए राज्य स्तर के शिक्षण संस्थानों में और सुधार की आवश्यकता है। इसके लिए राज्यपालों को कुलाधिपति के तौर पर शिक्षण संस्थानों के साथ नियमित संवाद को प्राथमिकता देने की जरूरत है। इससे उन संस्थानों के वातावरण में बदलाव आयेगा। विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में आप नैतिक और शैक्षणिक रूप से योग्य व्यक्तियों की समयबद्ध तरीके से नियुक्ति के रास्ते सुझा सकते हैं।

इस सम्मेलन में सार्वजनिक हित के मुद्दों पर संवाद करके कुछ रास्ते निकलने चाहिए। ऐसे मुद्दों पर इस सम्मेलन में राज्यपालों व उप-राज्यपालों के बीच चर्चाएँ होंगीं, जिनमे विभिन्न मंत्रीगण उपस्थित रहेंगे। मेरा विश्वास है कि इन चर्चाओं के दौरान सभी राज्यपाल अपने-अपने राज्य के लिये कुछ दूरगामी लक्ष्य तय करेंगे।

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