Krishna Sobti

सुप्रसिद्ध हिंदी लेखिका कृष्णा सोबती का 94 साल की उम्र में देहांत

सुप्रसिद्ध हिंदी लेखिका और विदुषी सुश्री कृष्णा सोबती का शुक्रवार को देहांत हो गया। वह 94 साल की थीं।

उन्हें  उपन्यास ज़िंदगीनामा के लिए 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था।

सुश्री कृष्णा सोबती को भारतीय साहित्य में उनके योगदान के लिए 2017 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी से सम्मानित किया गया था।

विदुषी कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी 1925 को अविभाजित भारत के गुजरात प्रांत में हुआ था।

स्व. सोबती ने 50 के दशक से अपना लेखन कार्य प्रारंभ किया था। उनकी पहली कहानी‘‘लामा’ थी जो 1950 में प्रकाशित हुई थी।

स्व. कृष्णा जी को अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया था।

इनमें 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण, साहित्य शिरोमणि सम्मान, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, साहित्य कला परिषद पुरस्कार, कथा चूड़ामणि पुरस्कार, हिंदी अकादमी पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार (2017) है।

कृष्णा सोबती के देहांत से साहित्य संसार में गहरा क्षोभ है।

साहित्य अकादमी ने कृष्णा सोबती की स्मृति को नमन करते हुए अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है।

साहित्य अकादमी ने कहा है कि भारतीय साहित्य में आपकी प्रतिष्ठा साफ.सुथरी रचनात्मकता और अप्रतिम अभिव्यक्ति के लिए रही है। आपने हिंदी की कथा-भाषा को अपनी विलक्षण प्रतिभा के ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है।

याद रखने की बात है कि कृष्णा जी की रचनात्मक संवेदनशीलता स्त्रियों और मुस्लिम समाज को बहुत आत्मीयता से स्पर्श करती है।

दक्षिण एशियाई साहित्य के परिदृश्य में इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम, जैसी दिग्गज पूर्ववर्ती लेखिकाओं से अलग कृष्णा सोबती अपनी रचनाओं में एक विशिष्ट संवेदना, मुहावरे और स्थानिक पर्यावरण की खुशबू को संजोए उद्वेलित, विचलित और रोमांचित करती हैं।

उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की है और भारतीय साहित्य को समृद्ध किया है।

उनमें से कुछ पुस्तकें हैं —डार से बिछुरी, मित्रो मरजानी, सूरजमुखी अंधेरे के, जिंदगीनामा, यारों के यार, तिनपहाड़, दिलो-दानिश, हम हशमत, बादलों के घेरे, मेरी मां कहां, सिक्का बदल गया आदि है।

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