G Madhvan Nair

ऐतिहासिक पीएसएलवी मिशन का नकारात्मक पहलू भी है : माधवन नायर

बेंगलुरू, 26 फरवरी | भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने हाल ही में एक साथ 104 उपग्रह प्रक्षेपित कर इतिहास रच दिया है और उसे दुनियाभर से बधाई संदेश मिल रहे हैं। लेकिन इस अभियान का एक नकारात्मक पहलू भी है, जो चिंता का विषय है।

इस अभियान को लेकर भारत ने दुनियाभर में अंतरिक्ष कार्यक्रमों में अपना डंका पीटा है, लेकिन इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने इस पर कुछ चिंता प्रकट की है। नायर के कार्यकाल में ही इसरो ने चंद्रमा पर चंद्रयान मिशन लॉन्च किया था।

नायर का मानना है कि इसरो के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के नवीनतम मिशन से अंतरिक्ष में उसके ही उपग्रहों को कुछ संभावित खतरे पैदा हो सकते हैं।

फाइल फोटो  : इसरो के पूर्व अध्यक्ष माधवन नायर

इसरो ने 15 फरवरी को विदेशी ग्राहकों के लिए एक रकम लेकर अंतरिक्ष में 100 से अधिक नैनो और माइक्रो उपग्रह छोड़े थे। इनमें से ‘डोव्स’ नामक 88 उपग्रह सैन फ्रांसिस्को की एक स्टार्ट-अप ‘प्लैनेट’ के हैं। इन सभी छोटे उपग्रहों को, जिनका आकार एक ब्रीफकेस से भी छोटा है, पीएसएलवी के जरिए एक सफल अभियान के तहत पृथ्वी से 506 किलोमीटर ऊपर एक ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया गया है।

नायर ने इस संवाददाता से कहा, “मैं थोड़ा चिंतित हूं, क्योंकि जिस स्थान पर इन्हें स्थापित किया गया है, यह वही स्थान है, जहां हमारे भू-अवलोकन उपग्रह हैं या होंगे।”

नायर ने कहा कि नैनो उपग्रहों का उपयोगी जीवन बेहद कम होता है, जिसके बाद वे कचरा बन जाते हैं और अंतरिक्ष में उसी कक्षा में घूमते रहते हैं। एक ही स्थान पर होने के कारण इनका इसरो के सक्रिय उपग्रहों से टकराने का खतरा बना रहता है।

नायर ने कहा, “अंतरिक्ष में थोड़े समय रहने के बाद ये नैनो उपग्रह, जो मलबा छोड़ते हैं, हमारे लिए खतरा बन सकते हैं। हमारे उपग्रहों की सुरक्षा ज्यादा जरूरी है।”

पूर्व इसरो अध्यक्ष ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इसरो को 500 किलोमीटर की कक्षा में विदेशी नैनो उपग्रहों की लॉन्चिंग से होने वाले कुछ लाख डॉलर के लाभ को, वर्तमान और भविष्य में उनके मार्गो के करीब स्थापित भू-अवलोकन उपग्रहों को होने वाले संभावित खतरे से नाप-तोल कर देखना चाहिए।

नायर ने कहा, “भविष्य में इन नैनो उपग्रहों में से किसी के भी मलबे और किसी अन्य देश के सक्रिय उपग्रह से टकराने की स्थिति में भारत को इसकी भरपाई करनी पड़ेगी।”

नायर ने कहा, “इसलिए, मैं नहीं जानता कि हमें ऐसा करना चाहिए या नहीं।”

नायर ‘अंतरिक्ष दायित्व संकल्प’ का जिक्र कर रहे थे, जो 1972 में प्रभावी हुआ था। इसके तहत उपग्रह छोड़ने वाले देशों को अपने क्षेत्र से छोड़े गए उपग्रहों की “अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी लेनी होगी, चाहे वह उपग्रह किसी भी देश का हो।”

नायर ने कहा कि कम समय तक उपयोगी रहने वाले नैनो उपग्रहों को अगर लॉन्च किया जाए तो उन्हें निचली कक्षाओं में ही स्थापित किया जाना चाहिए। पृथ्वी की निचली कक्षाओं में उत्पन्न हुआ कोई भी कचरा वायुमंडलीय प्रभाव से धरती पर आ जाएगा और काम कर रहे उपग्रहों के लिए कोई खतरा नहीं बनेगा।

उन्होंने कहा, “साथ ही, छोटे और नैनो उपग्रहों के लिए एक कक्षा निर्धारित करने के इस मुद्दे को बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की समिति में उठाया जाना चाहिए।”

इसरो अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वयन समिति (आईएडीसी) का एक सदस्य है, जो अनुसंधान साझा कर और मलबा शमन विकल्पों की पहचान कर मानव निर्मित व प्राकृतिक अंतरिक्ष मलबों को हटाने के वैश्विक प्रयासों का समन्वयन करती है।

इसरो के प्रवक्ता देवीप्रसाद कार्णिक ने कहा कि उनकी एजेंसी इसरो के पूर्व अध्यक्ष द्वारा जाहिर की गई चिंताओं पर ‘कोई टिप्पणी’ नहीं करना चाहती, लेकिन ‘प्लैनेट’ के प्रवक्ता रचेल होल्म ने नायर की चिंता को बेबुनियाद बताया और इसरो के उपग्रहों को कोई भी खतरा होने की बात सिरे से खारिज कर दी है।

कंपनी ने ईमेल के जरिए कहा है, “प्लैनेट में हमने अपने संचालन सिद्धांत की डिजाइन कचर शमन को ध्यान में रख कर तैयार की है।”

उन्होंने कहा, “हमारे डव्स एक स्वत: साफ होने वाली कक्षा में हैं। तीन-पांच सालों के बाद गुरुत्वाकर्षण हमारे उपग्रहों को पृथ्वी के वायुमंडल में खींच लाता है, जहां वे खुद ही पूरी तरह जल जाते हैं।”

हालांकि विभिन्न मंचों के अंतरिक्ष मलबा विशेषज्ञों ने नायर की चिंता का समर्थन किया है।

टोरंटो में हाल ही में हुए एक ‘इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉटिकल कांग्रेस’ में यूनिवर्सिटी ऑफ साउथंपटन के दिग्गज अंतरिक्ष मलबा विशेषज्ञ, हग लुईस ने कहा था कि 2005 से अब तक क्यूबसैट्स 3,60,000 से भी अधिक बार बिल्कुल टकराते-टकराते बचे हैं।

वर्ष 2014 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र को अंतरिक्ष में मौजूद मलबे के खतरनाक टुकड़ों से बचने के लिए तीन बार अपने स्थान से हटाना पड़ा था। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, उसका ‘स्वार्म-बी’ उपग्रह अंतरिक्ष के मलबे से चमत्कारिक ढंग से बचा था, जो उसके बेहद करीब (361 मीटर) आ गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि उपग्रह ड्रोन्स की तरह ही आम लोगों की पहुंच में आते जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की एक हालिया रपट के अनुसार, उपग्रहों को कक्षाओं में स्थापित करने के खर्च में कमी आने के कारण अंतरिक्ष में टकराव का खतरा बढ़ेगा।

–आईएएनएस