गांधी

कितना मुश्किल है गांधी की बात करना या गांधी के पीछे चलना

गांधीगांधी की बात करना या गांधी के पीछे चलना कितना मुश्किल है ।

ऐसे समय में जब संसार में चारों ओर धर्म के नाम पर हिंसा और मारकाट मची हो, आतंकी हमले हो रहे हों और निरीह मानव उसका शिकार हो रहा हो।

सवाल है ऐसे समय में गांधी कैसे हुआ जा सकता है?….किन्तु इसका उत्तर भी इसी प्रश्न में निहित है कि ऐसे समय ही गांधी की सार्थकता है। ऐसे समय जब हिंसा हो, मानवता कुचली जारही हो, करुणा तड़प रही हो ….. यही समय है गांधी की सार्थकता का।
तो सोचते हैं कि गांधी पथ पर चलने की पहली शर्त क्या है?
पहली शर्त है विचार और कर्म से मानव होना। दूसरा सबकी सर्व स्वीकार्यता यानि वह बात जो सबके हित में और सभी के स्वीकार्य योग्य हो उसे करना। बिना इन दो बातों के गांधी के पीछे कैसे चला जा सकता है। कैसे हुआ जा सकता है गांधी का अनुयायी।
बहुत मुश्किल है गांधी की बात करना भी। कोई भी इंसान अपने अहंकार, सत्ता-मद और अपना घमंड लेकर, अपनी ताकत लेकर गांधी की बात करता है या अनुयायी होने का दावा करता है तो वह समाज को ही नहीं, अपने आपको भी धोखा दे रहा होता है। पाखण्ड करता है। झूठ बोलता है। लोगों को ठगता है और सरे राह आँखों में धूल झोंकता है।

गांधी होने के लिए सब कुछ तिरोहित करना होता है। यहाँ तक कि आत्म-सम्मान भी भूलना होता है। किसी को अपना बनाने के लिए अपने अहंकार और अस्तित्व को दूसरे में समर्पित करना होता है।
गांधी होने के लिए एक ही शर्त है इंसान का अहिंसक, संवेदनशील, करुणामय और सत्यशील मानव में परिवर्तित हो जाना।
गांधी के नाम का अर्थ ही मानवीय होना है। मनुष्य के लिए मनुष्य होना ही गांधी है। गांधी है तो प्रेम है, अहिंसा है, दया है, करुणा है, स्नेह है, समरसता है। यही सब कुछ मिलकर गांधी बनता है। विचार और कर्म से अहंकार और आक्रोश से मुक्त होकर ही गांधी हुआ जा सकता है।
अगर ऐसा होता है तभी कोई सत्ताधीश, कोई राज नेता, कोई जन प्रतिनिधि गांधी का नाम लेने की सार्थकता सिद्ध कर सकता है।
तो आइए कुछ उदाहरण देखते हैं : गांधी ने हजारों समर्थकों की भीड़ में भी एक के विरोध को स्वीकार किया, उसे सुना, उसके क्रोध को अपशब्दों के रूप में निकलने दिया, जब तक वह विरोधी अपना विरोध दर्ज कराता रहा गांधी एक कदम भी आगे नहीं बढ़े। जब गांधी ने उसके क्रोध, आवेश और गालियों पर भी अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी तो वह झुंझलाकर वहाँ से यह कहते हुए निकल गया कि तुम आदमी हो या कुछ और हो….और यही गांधी होने का अर्थ है कि विरोध को तब तक स्वीकार करो जब तक सामने वाला अपने आवेश से, क्रोध से, अहंकार से मुक्त न हो जाए।
गांधी कभी सत्ता के लिए नहीं लड़े। गाँधी लड़े तो जन-जन की स्वतंत्रता के लिए लड़े। निरीह जनों के अधिकारों के लिए लड़े। अपने लिए गांधी ने कभी कोई लड़ाई नहीं लड़ी। गांधी अधिकार लिप्सा के लिए नहीं जिए। उन्होंने ब्रिटिश सत्त को अपनी अहिंसा से जीता, अहंकार और समूह की ताकत से नहीं। उन्होंने अपनी देह को गलाया तो हिंसा और शोषण के विरुद्ध व्रत किया, निराहार रहे किन्तु अपने लिए उन्होंने कुछ नहीं माँगा।
गांधी चाहते तो सत्ताजीवी हो सकते थे किन्तु नहीं हुए। विरोध करने वाले को कभी उन्होंने द्रोही नहीं कहा। करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास की ताकत उनके पास होने के बावजूद वह निर्विकार रहे। गांधी कहते थे कि सत्ता विकार पैदा करती है। वह इंसान को मानव समझने से दूर करती है, अहंकार और अधिकार लिप्सा को जन्म देती है। इसीलिए वह इससे दूर रहे।
गांधी जी के कुछ जीवंत उदाहरण हैं जिन्हें पढ़कर हम समझने की कोशिश करते हैं कि कितना मुश्किल है गांधी होना। क्या कोई इन परिस्थितियों में भी गांधी हो सकता है? गांधी का नाम लेने की पवित्रता रखता है?
यह बात 1947 के अप्रैल महीने की प्रार्थना सभा की है। गांधीजी उन दिनों दिल्ली में रहते थे। गांधी जी मंदिर में प्रार्थना के लिए जाते थे। प्रतिदिन शाम को प्रार्थना होती थी। गांधी की प्रार्थना सभा की प्रमुख बात यह थी कि उसमें सर्व धर्म प्रार्थना होती थी इसके बाद भजन और फिर राम धुन होती थी।
उस दिन गांधीजी की प्रार्थना सभा जैसे ही शुरू हुई मनु गांधी कुरान की कोई पंकित बोली कि तुरंत ही दो लोग खड़े हुए और बोले ‘आपको यदि यह प्रार्थना करनी है तो मंदिर से बाहर जाकर दूसरे मैदान में प्रार्थना करें।’ फिर एक युवक खड़ा हुआ और उसने जोर से कहा ‘हम आपको यहाँ प्रार्थना नहीं करने देंगे।’ कुछ लोगों ने उसे शांत करने की कोशिश की किन्तु वह नहीं माना।
गांधी ने शांत स्वर में उस युवक से कहा ‘आप जा सकते हैं अगर आपको प्रार्थना नहीं करनी है तो दूसरे को करने दे’। वह लड़का खामोश नहीं हुआ और बोला- ‘हम आपको प्रार्थना नहीं करने देंगे।’
गांधीजी यह देखकर खड़े हुए और उस लड़के पास गए जो आवेश में बार-बार भला-बुरा कह रहा था, लोग उसको पीछे खींच रहे थे। गांधी जी ने उस लड़के को छोड़ देने के लिए कहा ‘कोई इसके और मेरे बीच ना आए’।
गांधी के समझाने पर भी जब लड़का नहीं समझा और निरंतर बहस करता रहा तो लोगों का धैर्य जवाब दे गया और उसे पकड़ कर प्रार्थना स्थल से बाहर कर दिया।
गांधी जी यह देखकर आहत होगए और उन्होंने कहा ‘ठीक नहीं किया आप लोगों ने। जबरदस्ती निकाल दिया। ’
यह मसला दो दिनों तक चलता रहा। वह 4 अप्रैल 1947 का दिन था। उस दिन प्रार्थना हुई और गांधी जी ने कहा ‘अहिंसा परमोधर्म हिन्दू धर्म ने सिखाया है।’ और फिर प्रार्थना होती रही। कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद गांधी जी फिर अगली यात्रा पर निकल गए।
यह कुछ उदाहरण हैं जो गांधी होने का अर्थ समझाते हैं।

अब भारत विभाजन पर गांधी को समझने की कोशिश करें…..
देश में ऐसे अनेक लोग हैं जो भारत विभाजन के लिए गाँधी जी पर प्रहार करने से आज भी नहीं चूकते हैं। बीते सालों में हमने गांधी की तस्वीरों को कत्ल होते देखा है। लोगों को नहीं मालूम कि विभाजन से ठीक पहले परिस्थितियाँ कितनी गंभीर हो गई थी। विभाजन का जो दर्द गांधी महसूस कर रहे थे वह किसी के साथ बाँट भी नहीं सकते थे। विभाजन से पहले 1 जून, 1947 को गाँधी ने जो महसूस किया वह यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। (संदर्भ पुस्तक खान अब्दुल गफ्फार खाँ, लेखक – डी जी तेंदुलकर, सम्मतियाँ राष्ट्रपति वराह वेंकट गिरि, जाकिर हुसैन)
गांधी कहते हैं ‘‘आज मैं अपने को बिल्कुल अकेला पाता हूँ। यहाँ तक कि सरदार और जवाहरलाल की मेरी धारणा को गलत समझते हैं और यह मानते हैं कि यदि विभाजन मान लिया जाय तो शांति निश्चित रूप से कायम हो जायगी। मेरा वाइसराय से यह कहना भी है कि यदि विभाजन होना ही है तो इसे ब्रिटिश हस्तक्षेप या ब्रिटिश शासन के अंतर्गत नहीं होना चाहिए, पसंद नहीं आया। उन्हें यह आशंका होती है कि कहीं वृद्धावस्था के कारण मेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? फिर भी जैसा कि मैं दावा करता हूँ यदि मुझे कांग्रेस और ब्रिटिश जनता के प्रति अपने को निष्ठावान मित्र साबित करना है तो मैं जो अनुभव कर रहा हूँ उसे मुझे कहना ही होगा। मैं साफ-साफ देख रहा हूँ कि हम लोग सारा काम गलत ढंग से कर रहे हैं। हम इसके पूरे परिणाम का इस समय भले ही अंदाजा न लगा पाते हों लेकिन मुझे तो साफ दिखाई दे रहा है कि इस कीमत पर मिली आजादी अंधकार पूर्ण होगी।
गांधी ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा ‘हो सकता है कि वह सभी लोग सही हो और अकेला मैं ही अंधेरे में भटक रहा होऊँ। संभवतः मैं इसे देखने के लिए जिंदा न रहूँ किंतु आज मैं जिस अशुभ की आशंका कर रहा हूँ यदि वह भारत पर छा गया और उसकी स्वतंत्रता खतरे में पड़ गयी तो भावी संतति को यह मालूम रहे कि इसके बारे में सोचते हुए इस बुड्ढे आदमी को कैसी पीड़ा का अनुभव हुआ था। कभी यह न कहा जाय कि गांधी राष्ट्र के अंग-भंग में भागीदार हुआ था। किंतु आज तो सभी लोग आजादी के लिए अधीर हो रहे हैं। इसलिए लाचारी है।’
गांधीजी ने विभाजन के साथ आजादी की उपमा उस ‘काठ की रोटी’ से दी थी जिसे यदि कांग्रेसी नेताओं ने खाया तो वे उदर-शूल से मर जायेंगे और नहीं खाया तो भूखों मर जायेंगे।

गांधी का दर्द यह बताने के लिए पर्याप्त है कि वह भारत विभाजन की पीड़ा को किस तरह अनुभव कर रहे थे और वह परिस्थितियां कैसे विकट थी जिसमें उन्हें अपना कोई दिखाई ही नहीं दे रहा था जिसे अपने मन की पीड़ा समझा सकें। किसी भी राष्ट्र के जीवन में यह ऐसी दुविधा का समय होता है जिसे नियति ही जानती है, मनुष्य नहीं।

..और गांधी को समझने के लिए भरोसे की, त्याग की और निष्ठा की जरूरत होती है और उस काल खण्ड में उन सभी लोगों ने गांधी को अकेला छोड़ दिया था और गांधी के अनुयायी सत्ता के रथ पर सवार होकर गांधी से दूर चले गए थे और आज भी हम न चाहते भी उनका नाम लेकर गौरवान्वित महसूस करते हुए राज-सुख भोग रहे हैं।
…..तो ऐसे थे गांधी और कांटों से भरा था उनका अहिंसा-पथ।

बृजेन्द्र रेही