नदी जोड़ आजादी के बाद सबसे बड़ी साजिश : राजेंद्र

देश की सबसे बड़ी परियोजना कही जाने वाली नदी-जोड़ को एक बार फिर मौजूदा सरकार शुरू करने का मन बना रही है। सरकारी तंत्र का मानना है कि देश में बाढ़-सुखाड़ का यह एकमात्र समाधान है। लेकिन जल कार्यकर्ता और स्टॉक होम जल पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह इसे आजादी के बाद की सबसे बड़ी साजिश मानते हैं। उनका कहना है कि इससे समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि समस्याएं और बढ़ जाएंगी।

राजेंद्र ने आईएएनएस के साथ यहां विशेष बातचीत में कहा, “नदी जोड़ एक झूठा सपना है, जो सचमुच लालची विकास का सपना है और इसमें देश का सबसे बड़ा नुकसान है। सच तो यह है कि आजादी के बाद की यह सबसे बड़ी साजिश है, सबसे बड़ा घोटाला है।”

पिछली राजग सरकार की नदी-जोड़ परियोजना पर विशेषज्ञ समिति के सदस्य रह चुके राजेंद्र ने कहा, “वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस परियोजना को शुरू किया था, लेकिन पहली परियोजना केन-बेतवा ही पूरी नहीं हो पाई। संप्रग सरकार ने भी तमाम अध्ययनों के बाद इसे ठंढे बस्ते में डाल दिया था। यह सरकार फिर इसे शुरू करना चाहती है, जो कभी पूरी नहीं हो पाएगी।”

केन बेतवा नदी-जोड़ की विफलता के बारे में उन्होंने कहा, “इसपर 2005 से 2007 तक अध्ययन किया गया। प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल, प्रोफेसर राशिद हयात सिद्दीकी, पारितोष त्यागी, डॉ. रवि चोपड़ा, और मैंने मिलकर अध्ययन किया। पीएसआई देहरादून के इस अध्ययन में केन-वेतवा जोड़ को बहुत खतरनाक माना गया।”

राजेंद्र ने आगे कहा, “दरअसल, एक नदी से दूसरी नदी में पानी ले जाना बहुत महंगा और कठिन काम है। इसमें मशीनें लगेंगी, इंफ्रास्ट्रक्च र बनाया जाएगा, वह पैसा कहां से आएगा? इससे पानी की कीमत कई गुना बढ़ जाएगी। इन बुनियादी सवालों की समझ नदी-जोड़ के सपने देखने वालों को नहीं है।”

उन्होंने कहा, “इसके लिए बड़े-बड़े बांध बनाने पड़ेंगे। बड़ी मात्रा में जमीनें डूबेंगी। फिर आपको पानी की कीमत भी देनी पड़ेगी।”

राजेंद्र ने कहा कि 2002 में ही इस परियोजना की लागत 6 लाख 80 हजार करोड़ रुपये आंकी गई थी, जो आज कम से कम 10 गुना बढ़ जाएगी।

तो क्या सरकार इतनी नासमझ है? इस सवाल पर राजेंद्र ने कहा, “दरअसल, सरकार को समझाने का काम बहुराष्ट्रीय कंपनियां करती हैं। वे कोई भी डीपीआर (विस्तृत परियोजना रपट) पास करा लेती हैं। इसमें सबकी मिलीभगत होती है। सबको लाभ होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके जरिए देश के जल और जलस्रोतों पर कब्जा करना चाहती हैं।”

फिर देश में बाढ़-सुखाड़ का समाधान क्या हो सकता है? मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र ने कहा,”नदियों से समाज को जोड़ने की जरूरत है। मैंने यही काम किया है, और इस बात को साबित किया है कि यदि ऐसा हो जाए तो बाढ़-सुखाड़ की समस्या समाप्त हो जाएगी। न कोई नुकसान, न विस्थापन। न किसी का घर टूटेगा और न कोई पेड़ कटेगा।” उन्होंने कहा कि देश में अबतक बांधों से हुए विस्थापन का मुद्दा आज तक नहीं सुलझ पाया है।

उल्लेखनीय है कि राजेंद्र ने राजस्थान के अलवर जिले में मर चुकी अरवरी नदी को जिंदा किया है। इसके कारण अकाल ग्रस्त इलाका आबाद हो गया है। गांवों से पलायन कर चुके लोग वापस अपने गांवों को लौट आए हैं। इसीलिए उन्हें 2001 में मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह अबतक 11,000 से अधिक तालाब बनवा चुके हैं।

राजेंद्र ने कहा कि उन्होंने नदी-जोड़ पर विशेषज्ञ समिति का सदस्य रहते हुए इसके खिलाफ आवाज उठाई थी।

उन्होंने कहा, “मैंने नदी-जोड़ के खिलाफ हर मंच पर आवाज उठाई थी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी ने इस परियोजना को बाद में ठंडे बस्ते में डाल दिया था। संप्रग सरकार ने भी इस पर काफी शोध करवाने के बाद इसे ठंढे बस्ते में डाल दिया था। मुझे पूरी उम्मीद है कि यह सरकार भी इसे ठंढे बस्ते में डाल देगी।”

तो क्या वह इस परियोजना के खिलाफ फिर आंदोलन करेंगे? जलपुरुष के नाम से मशहूर राजेंद्र ने कहा, “नदी जोड़ के खिलाफ बहुत-सी आवाजें पहले से मौजूद हैं और वह इन आवाजों को एकजुट करने का काम कर रहे हैं।”

उन्होंने आगाह किया, “यदि सरकार नदी-जोड़ पर आगे बढ़ती है, तो यह तीसरे विश्वयुद्ध का उद्गम होगा, जैसा कि कावेरी नदी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में हुआ है।”

उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए कावेरी नदी से 15 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया था। जिसके विरोध में कर्नाटक में भारी हिंसा हुई है।

राजेंद्र ने पानी पर न्यायालय के फैसले के बारे में कहा, “संविधान में पानी को लेकर स्पष्टता नहीं है। चूंकि यह संविधान में नहीं है, इसलिए न्यायाधीश के पास सबसे बड़ा संकट होगा कि वह किस रोशनी में फैसला ले।” उन्होंने कहा कि इसके लिए जल सुरक्षा अधिकार अधिनियम बनाया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि नदी-जोड़ परियोजना के तहत देश की 30 बड़ी-छोटी नदियों को नहरों, बांधों के जरिए जोड़ना है। इसका सपना सबसे पहले 19वीं सदी में सर आर्थर काटन ने देखा था। इसके बाद केंद्रीय मंत्री डॉ के.एल. राव ने सन 1972 में दक्षिण भारत के जल संकट को हल करने के लिए गंगा को कावेरी से जोड़ने की अवधारणा पेश की थी। उसके बाद 2002 में राजग सरकार ने इस परियोजना को हरी झंडी दी। बाद में परियोजना लटक गई। संप्रग सरकार ने भी इस पर काफी अध्ययन कराया, और अंत में इसे ठंढे बस्ते में डाल दिया।–शिखा त्रिपाठी