Modi

राजनीति से हटकर रोटी,पानी और पक्षियों की बात करते प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 30 अप्रैल, 2017 के ‘मन की बात’ के प्रसारण से कुछ अंश

हर बार जितने inputs ‘मन की बात’ के लिये आते हैं, सरकार में उसका detail analysis होता है | सुझाव किस प्रकार के हैं, शिकायतें क्या हैं, लोगों के अनुभव क्या हैं | आमतौर पर यह देखा गया है कि मनुष्य का स्वभाव होता है दूसरे को सलाह देने का | ट्रेन में, बस में जाते और किसी को खांसी आ गयी तो तुरंत दूसरा आकर के कहता कि ऐसा करो | सलाह देना, सुझाव देना, ये जैसा मानो हमारे यहाँ स्वभाव में है | शुरू में ‘मन की बात’ को लेकर के भी जब सुझाव आते थे, सलाह के शब्द सुनाई देते थे, पढ़ने को मिलते थे, तो हमारी टीम को भी यही लगता था कि ये बहुत सारे लोगों को शायद ये आदत होगी, लेकिन हमने ज़रा बारीकी से देखने की कोशिश की तो मैं सचमुच में इतना भाव-विभोर हो गया |

ज़्यादातर सुझाव देने वाले लोग वो हैं, मुझ तक पहुँचने का प्रयास करने वाले लोग वो हैं, जो सचमुच में अपने जीवन में कुछ-न-कुछ करते हैं | कुछ अच्छा हो उस पर वो अपनी बुद्धि, शक्ति, सामर्थ्य, परिस्थिति के अनुसार प्रयत्नरत हैं | और ये चीजें जब ध्यान में आयी तो मुझे लगा कि ये सुझाव सामान्य नहीं हैं | ये अनुभव के निचोड़ से निकले हुए हैं | कुछ लोग सुझाव इसलिये भी देतें हैं कि उनको लगता है कि अगर यही विचार वहाँ, जहाँ काम कर रहे हैं, वो विचार अगर और लोग सुनें और उसका एक व्यापक रूप मिल जाए तो बहुत लोगों को फायदा हो सकता है | और इसलिये उनकी स्वाभाविक इच्छा रहती है कि ‘मन की बात’ में अगर इसका ज़िक्र हो जाए | ये सभी बातें मेरी दृष्टि से अत्यंत सकारात्मक हैं |

पिछली बार ‘मन की बात’ में कुछ लोगों ने मुझे सुझाव दिया था food waste हो रहा है, उसके संबंध में चिंता जताई थी और मैंने उल्लेख किया | और जब उल्लेख किया तो उसके बाद NarendraModiApp पर, MyGov पर देश के अनेक कोने में से अनेक लोगों ने, कैसे-कैसे innovative ideas के साथ food waste को बचाने के लिये क्या-क्या प्रयोग किये हैं | मैंने भी कभी सोचा नहीं था आज हमारे देश में खासकर के युवा-पीढ़ी, लम्बे अरसे से इस काम को कर रही है | कुछ सामाजिक संस्थायें करती हैं, ये तो हम कई वर्षों से जानते आए हैं, लेकिन मेरे देश के युवा इसमें लगे हुए हैं – ये तो मुझे बाद में पता चला | कइयों ने मुझे videos भेजे हैं | कई स्थान हैं जहाँ रोटी बैंक चल रही हैं | लोग रोटी बैंक में, अपने यहाँ से रोटी जमा करवाते हैं, सब्जी जमा करवाते हैं और जो needy लोग हैं वे वहाँ उसे प्राप्त भी कर लेते हैं | देने वाले को भी संतोष होता है, लेने वाले को भी कभी नीचा नहीं देखना पड़ता है | समाज के सहयोग से कैसे काम होते हैं, इसका ये उदाहरण है |

श्रीमान प्रशांत कुमार मिश्र, टी.एस. कार्तिक ऐसे अनेक मित्रों ने पक्षियों की चिंता की है | उन्होंने कहा कि बालकनी में, छत पर, पानी रखना चाहिये | और मैंने देखा है कि परिवार के छोटे-छोटे बालक इस बात को बखूबी करते हैं | एक बार उनको ध्यान में आ जाए कि ये पानी क्यों भरना चाहिये तो वो दिन में 10 बार देखने जाते हैं कि जो बर्तन रखा है उसमें पानी है कि नहीं है | और देखते रहते हैं कि पक्षी आये कि नहीं आये |  हमें तो लगता है कि ये खेल चल रहा है लेकिन सचमुच में, बालक मन में ये संवेदनायें जगाने का एक अद्भुत अनुभव होता है |  आप भी कभी देखिये पशु-पक्षी के साथ थोड़ा सा भी लगाव एक नये आनंद की अनुभूति कराता है |

कुछ दिन पहले मुझे गुजरात से श्रीमान जगत भाई ने अपनी एक किताब भेजी है ‘Save The Sparrows’ और जिसमें उन्होंने गौरैया की संख्या जो कम हो रही है उसकी चिंता तो की है लेकिन स्वयं ने mission mode में उसके संरक्षण के लिये क्या प्रयोग किये हैं, क्या प्रयास किये हैं, बहुत अच्छा वर्णन उस किताब में है | वैसे हमारे देश में तो पशु-पक्षी, प्रकृति उसके साथ सह-जीवन की बात, उस रंग से हम रंगे हुए हैं लेकिन फिर भी ये आवश्यक है कि सामूहिक रूप से ऐसे प्रयासों को बल देना चाहिये | जब मैं गुजरात में मुख्यमंत्री था तो ‘दाऊदी बोहरा समाज’ के धर्मगुरु सैयदना साहब को सौ साल हुए थे | वे 103 साल तक जीवित रहे थे | और उनके सौ साल निमित्त बोहरा समाज ने Burhani foundation के द्वारा sparrow को बचाने के लिये एक बहुत बड़ा अभियान चलाया था | इसका शुभारम्भ करने का मुझे अवसर मिला था | क़रीब 52 हज़ार bird feeders उन्होंने दुनिया के कोने-कोने में वितरित किये थे | Guinness book of World Records में भी उसको स्थान मिला था |

कभी-कभी हम इतने व्यस्त होते हैं तो, अखबार देने वाला, दूध देने, सब्जी देने वाला, पोस्टमैन, कोई भी हमारे घर के दरवाजे से आता है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि गर्मी के दिन हैं ज़रा पहले उसको पानी का तो पूछें !