(जनसमाचार विशेष रिपोर्ट )
नई दिल्ली, 6 जुलाई। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence-AI) ने दुनिया भर के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) उद्योग की कार्यशैली बदलनी शुरू कर दी है और इसका सबसे बड़ा प्रभाव भारत पर दिखाई दे रहा है। लगभग 315 अरब डॉलर के भारतीय आईटी उद्योग, जिसने पिछले तीन दशकों में देश को वैश्विक आउटसोर्सिंग का केंद्र बनाया, अब एक नए परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले पाँच वर्षों में भारतीय आईटी कंपनियों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे एआई को कितनी तेजी से अपनाती हैं।
भारत की प्रमुख आईटी कंपनियाँ—Tata Consultancy Services, Infosys, HCLTech और Wipro—इन दिनों अपने तिमाही वित्तीय परिणाम घोषित करने की तैयारी में हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि इस बार आय में वृद्धि सामान्य से कम रह सकती है। इसकी दो प्रमुख वजहें हैं—अमेरिका और यूरोप के ग्राहकों द्वारा खर्च में कटौती तथा एआई आधारित स्वचालन का तेजी से बढ़ता उपयोग।
भारतीय आईटी उद्योग का विकास अब तक बड़े पैमाने पर मानव संसाधन पर आधारित रहा है। सॉफ्टवेयर विकास, परीक्षण, तकनीकी सहायता और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग जैसे क्षेत्रों में लाखों इंजीनियर कार्यरत हैं। लेकिन अब वही कार्य एआई आधारित उपकरण पहले की तुलना में कम समय और कम लागत में करने लगे हैं। इससे कंपनियाँ भर्ती की गति धीमी कर रही हैं और पारंपरिक नौकरियों की संख्या पर दबाव बढ़ रहा है।
हालांकि विशेषज्ञ इसे केवल संकट नहीं मानते। उनका कहना है कि एआई नई प्रकार की नौकरियाँ भी पैदा कर रहा है। मशीन लर्निंग, डेटा इंजीनियरिंग, एआई मॉडल प्रशिक्षण, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में योग्य पेशेवरों की मांग लगातार बढ़ रही है। हाल ही में जारी एक रोजगार अध्ययन के अनुसार भारत में एआई से जुड़े पदों पर भर्ती में 16 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई, जबकि कुल आईटी भर्ती में 3 प्रतिशत की गिरावट आई। यह संकेत देता है कि कंपनियाँ सामान्य भर्ती कम कर रही हैं, लेकिन एआई विशेषज्ञों की तलाश तेज हो गई है।
भारत में इस परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव इंजीनियरिंग शिक्षा और कौशल विकास पर पड़ेगा। देश हर वर्ष लाखों इंजीनियर तैयार करता है, लेकिन उद्योग अब केवल डिग्री नहीं बल्कि एआई, डेटा विश्लेषण, ऑटोमेशन और क्लाउड तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान चाहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शैक्षणिक संस्थान समय रहते अपने पाठ्यक्रमों में बदलाव नहीं करते, तो कौशल और रोजगार के बीच अंतर और बढ़ सकता है।
बाजार में भी एआई का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इस वर्ष निवेशकों की चिंता के कारण भारतीय आईटी शेयरों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। निवेशकों को आशंका है कि यदि कंपनियाँ अपने पारंपरिक सेवा मॉडल को एआई के अनुरूप नहीं बदल पाईं तो उनकी आय और लाभ दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसके बावजूद कई विश्लेषकों का मानना है कि जो कंपनियाँ समय रहते एआई आधारित सेवाओं में निवेश करेंगी, वे भविष्य में अधिक प्रतिस्पर्धी बनकर उभरेंगी।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत के लिए सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल तकनीकी मानव संसाधन है। यदि यही कार्यबल एआई आधारित नई तकनीकों में प्रशिक्षित हो जाए, तो भारत केवल आईटी सेवाओं का केंद्र ही नहीं, बल्कि एआई समाधान विकसित करने वाला वैश्विक नेतृत्वकर्ता भी बन सकता है। कई भारतीय कंपनियाँ पहले ही अपने कर्मचारियों को एआई प्रशिक्षण देने, आंतरिक उत्पाद विकसित करने और वैश्विक ग्राहकों के लिए एआई आधारित समाधान तैयार करने में निवेश बढ़ा रही हैं।
आर्थिक दृष्टि से भी यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है। भारतीय आईटी उद्योग देश के सेवा निर्यात का प्रमुख आधार है और लाखों परिवारों की आय इससे जुड़ी हुई है। यदि एआई के कारण रोजगार संरचना बदलती है तो सरकार, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर कौशल उन्नयन (Reskilling) और पुनः कौशल विकास (Upskilling) पर विशेष ध्यान देना होगा। इससे रोजगार पर संभावित नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकेगा और भारत वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रख सकेगा।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारतीय आईटी उद्योग के लिए दोधारी तलवार साबित हो रही है। एक ओर पारंपरिक नौकरियों पर दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर नई तकनीकों और उच्च कौशल वाले रोजगार के अवसर भी तेजी से पैदा हो रहे हैं। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि उसका विशाल युवा तकनीकी कार्यबल इस बदलाव के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सके। यदि ऐसा हुआ, तो एआई भारत के आईटी उद्योग के लिए खतरा नहीं बल्कि अगले विकास चरण का सबसे बड़ा आधार बन सकता है।
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