Supreme Court

कुछ प्रतिबंधों को छोड़कर इंटरनेट सेवा मूल अधिकार : उच्‍चतम न्‍यायालय

उच्‍चतम न्‍यायालय (Supreme Court) ने कहा है कि कुछ प्रतिबंधों को छोड़कर संविधान के अनुच्‍छेद 19 के तहत इंटरनेट सेवा (Internet services) मूल अधिकार (fundamental right) है।

उच्‍चतम न्यायालय ने शुक्रवार 10 , जनवरी,2020 को जम्मू-कश्मीर प्रशासन (Jammu and Kashmir administration) से एक सप्ताह के भीतर समीक्षा करने के लिए कहा है।

केंद्र शासित प्रदेश में धाराएं लगाने वाले सभी आदेशों की इंटरनेट तक पहुंच को रोकना संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत एक मौलिक अधिकार है।

न्‍यायमूर्ति एन.वी. रमणा (Justice N V Ramana)  की अध्‍यक्षता वाली तीन न्‍यायाधीशों की पीठ ने प्रशासन को अस्‍पतालों, औद्योगिक और शिक्षण संस्थाओं जैसी आवश्‍यक सेवाएं उपलब्‍ध कराने वाले सभी संस्‍थानों में इंटरनेट सेवाएं (Internet services)  बहाल करने का भी निर्देश दिया है।

उच्‍चतम न्‍यायालय (Supreme Court)  का यह फैसला जम्मू-कश्मीर  में पिछले साल 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर में लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं  पर आया है।

उच्‍चतम न्‍यायालय (Supreme Court)  के तीन न्‍यायाधीशों की पीठ में न्‍यायमूर्ति बी.आर. गवई और आर.सुभाष रेड्डी शामिल हैं।

उच्‍चतम न्‍यायालय (Supreme Court) की पीठ ने कहा कि अभिव्‍यक्ति की आजादी और असहमति को दबाने के लिए निषेधाज्ञा का अनिश्चितकाल तक इस्‍तेमाल नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि निषेधाज्ञा आदेश जारी करते समय मजिस्‍ट्रेटों को अपने विवेका का इस्‍तेमाल करना चाहिए।

पीठ ने कहा कि प्रेस की आजादी ( freedom of press) मूल्‍यवान और पवित्र अधिकार (sacred right) है।

पीठ ने उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिए, जिनमें 5 अगस्‍त को अनुच्‍छेद 370 के प्रावधान निरस्‍त करने के केन्‍द्र के कदम के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर में लागू प्रतिबंधों को चुनौती दी गई है।

ये याचिकाएं उन याचिकाओं से अलग हैं, जिनमें अनुच्‍छेद 370 को निरस्‍त करने की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है और जिनकी सुनवाई पांच न्‍यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है। उस पीठ में सुनवाई 21 जनवरी को फिर शुरू होगी।