अंधेरे के बीच रोशनी की लकीर रहा रियो ओलम्पिक

हरदेव सनोत्रा===ब्राजील की मेजबानी में आयोजित 31वें ओलम्पिक खेलों का समापन हो चुका है और 130 करोड़ की आबादी वाले भारत को खेलों के इस महाकुंभ में सिर्फ एक कांस्य और एक रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा।

चार साल पहले लंदन ओलम्पिक-2012 में हासिल किए छह पदकों की सूरत को बदलने और सुधार करने की सारी उम्मीदें इस ओलम्पिक में एक-एक कर धराशायी होती गईं।

भारतीय ओलम्पिक संघ (आईओए) के अधिकारियों ने रियो ओलम्पिक शुरू होने से पहले कहा था कि उन्हें इस बार दहाई की संख्या में पदकों की उम्मीद है, लेकिन उनकी इस उम्मीद को खेलों के शुरुआती दिनों में ही झटके लगने शुरू हो गए थे। शुरुआत से ही हमारे खिलाड़ी एक-एक कर क्वालीफाइंग दौर से ही बाहर होते जा रहे थे।

पदकों के अकाल के बीच छाई घनी अंधियारी में दो महिला खिलाड़ियों ने भारत की लाज बचाई और भारत की खाली झोली में दो पदक डाले।

हरियाणा की महिला पहलवान साक्षी मलिक ने कांस्य पदक जीत देश का खाता खोला और रविवार को हुए समापन समारोह में भारतीय ध्वज थामने का उन्हें सौभाग्य मिला।

देश की अग्रणी महिला बैडमिंटन खिलाड़ी पी. वी. सिंधु ने भारत को गर्व करने का एक और मौका दिया। उन्होंने बड़ी मेहनत कर भारत की झोली में रजत पदक डाला।

महिला जिम्नास्ट दीपा कर्माकर मामूली अंतर से पदक से चूक गईं लेकिन उन्होंने पूरे विश्व में लोगों का दिल जीता और भारतीय सम्मान की रक्षा की।

महिला गोल्फ खिलाड़ी अदिती अशोक ने शुरुआत में दमदार प्रदर्शन करने के बाद अंतत: निराश किया। शुरुआती दो राउंड तक शीर्ष-10 में रहने वाली अदिती ओवरऑल 41वां स्थान हासिल कर सकीं।

ओलम्पिक में 112 वर्ष के बाद गोल्फ की वापसी हुई थी और स्पर्धा में 18 वर्षीया अदिती सबसे कम उम्र की प्रतिभागी थीं। बेंगलुरू की रहने वाली अदिती को हालांकि शुरुआत में शानदार प्रदर्शन करने के लिए काफी सराहना मिली है।

महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपलचेज रेस के फाइनल में पहुंचने वाली ललिता बाबर ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया हालांकि वह 10वें स्थान पर रहीं।

भारत को 31वें ओलम्पिक खेलों में पुरुष खिलाड़ियों ने सर्वाधिक निराश किया। बीजिंग ओलम्पिक-2008 में स्वर्ण पदक जीतने बाले निशानेबाज अभिनव बिंद्रा कांस्य पदक के बिल्कुल नजदीक पहुंचकर लड़खड़ा गए।

अब तक का अपना सबसे बड़ा ओलम्पिक दल भेजने के बावजूद भारत पिछले प्रदर्शन से भी कमतर रहा। भारत ने रियो ओलम्पिक में 117 खिलाड़ियों का दल भेजा था।

बिंद्रा के कोच हेंज रिइंकमिएर ने शायद ठीक ही कहा, “आप एक ऐसे देश के खिलाड़ियों से स्वर्ण पदक की उम्मीद करते हैं, जहां यूरोप और चीन की तुलना में प्रशिक्षण की सही सुविधाएं भी नहीं हैं।”

लेकिन यह शायद सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं की बात नहीं है बल्कि खेलों को स्कूल के स्तर से लेकर ओलम्पिक तक समर्थन की जरूरत है जो भारत में थोड़ा मुश्किल जरूर है।

भारत पदकों के सूखे से तो जूझ ही रहा था आखिरी समय में पहलवान नरसिंह यादव पर लगे प्रतिबंध ने भारत की उम्मीदों को करारा झटका दे दिया।

विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी (वाडा) ने भारत के राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी (नाडा) द्वारा नरसिंह को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले को खेल पंचाट न्यायालय (सीएएस) में चुनौती दी और सीएएस ने नरसिंह के खिलाफ साजिश की दलील को नकारते हुए उन पर प्रतिबंध लगा दिया।

निशानेबाज जीतू राय 10 मीटर एअर पिस्टल स्पर्धा के फाइनल में तो पहुंचे, लेकिन फाइनल में वह आठवां स्थान ही हासिल कर सके। इसके बाद जीतू 50 मीटर एअर पिस्टल स्पर्धा के फाइनल में भी प्रवेश नहीं कर सके।

गुरमीत सिंह ने 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल स्पर्धा में कुछ उम्मीद बांधी लेकिन वह इसे पूरा नहीं कर सके। मेराज अहमद खान भी फाइनल में पदक पर निशाना लगाने से चूक गए।

मुक्केबाज भी भारत की पदक की उम्मीद को हकीकत में नहीं बदल सके। विकास कृशन यादव 75 किलोग्राम भारवर्ग में, शिव थापा 56 किलोग्राम भारवर्ग में और मनोज कुमार 64 किलोग्राम भारवर्ग में भारत की मायूसी को दूर नहीं कर सके।

हालांकि रियो ओलम्पिक-2016 इतिहास में अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों के लिए जरूर जाना जाएगा। विश्व के दिग्गज खिलाड़ियों ने यहां ऐसे रिकार्ड बनाए जिन्हें कई दशकों तक छू पाने के बारे में सोचना भी किसी के लिए आसान नहीं होगा।

अमेरिकी तैराक माइकल फेल्प्स ने तैराकी में वह हासिल किया जो दूसरों के लिए सपना होता है। कुल 28 ओलम्पिक पदकों के साथ उन्होंने खेल को यहां अलविदा कहा और न भूलने वाली विदाई ली। उनके नाम 13 व्यक्तिगत स्वर्ण और 10 टीम स्वर्ण पदक हैं।

फेल्प्स के अलावा जमैका के उसेन बोल्ट भी ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने यहां जीत की नई इबारत लिखी। बोल्ट 100 मीटर, 200 मीटर और 4 गुणा 100 मीटर रिले रेस, तीनों स्पर्धाओं में लगातार तीसरी बार अपनी बादशाहत कायम रखी। बोल्ट लगातार तीन ओलम्पिक में तीन-तीन स्पर्धाओं के स्वर्ण जीतने वाले दुनिया के पहले एथलीट बन गए। उनकी यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए बेशक प्ररेणा स्रोत होगी।

रियो में कई विश्व और ओलम्पिक रिकार्ड भी टूटे जिसने खेलों को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया।

भारतीय खिलाड़ी भी यहां कुछ ऐसा ही करने आए थे, लेकिन दुर्भाग्यवश असफल होकर लौटे।

खेलों के बाद भारत में इस बात पर जरूर बहस होगी कि हम रियो में पीछे कैसे रह गए। इस प्रदर्शन के बाद क्या टोक्यो ओलम्पिक-2020 में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद लगाई जा सकती है?