दुनिया एक बार फिर ऐसे चौराहे पर खड़ी नजर आ रही है, जहां भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है। पिछले कुछ महीनों से, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता का एक प्रमुख कारण बना हुआ है। पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियाँ, समुद्री मार्गों पर मंडराते खतरे और तेल आपूर्ति के संबंध में अनिश्चितता ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है।
दुनिया एक बार फिर से जारी स्टॉक पर स्टॉक नजर आ रही है, जहां भू-राजनीतिक खुलासे-स्ट्रीट का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है। पिछले कुछ महीनों से ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों के लिए चिंता का एक बड़ा कारण बना हुआ है। पश्चिम एशिया में सैन्य शस्त्रागार, समुद्री भंडारों पर डायनामाइट खतरे और तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है।
विशेषज्ञ के अनुसार, तेल बाजार में इस मझाले बाजार की सबसे ज्यादा मार झेल रही है। ‘होरमुज़ जलडमरूमध्य’ (होर्मुज़ जलडमरूमध्य) से विश्व के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा है। यदि यह मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति खतरे में पड़ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप तेल की विशिष्टता में भारी उछाल आ सकता है। इसी चिंता की वजह से हाल के महीनों में ‘ब्रेंट क्रूड’ (ब्रेंट ऑयल) की कंसल्टेंसी 100 डॉलर प्रति पाउंड के करीब बनी हुई है।
हालाँकि, संघर्ष-विराम और चमत्कारिक बातचीत की समानता के जीवन हाल के दिनों में तेल की झील में कुछ नैरागी आई है, लेकिन बाज़ार में अभी भी पूरी तरह से चित्रण नहीं है। इस बात को लेकर चिंता इस बात की है कि अगर यह बातचीत विफल रही, तो निजीकरण एक बार फिर स्थिरता से बढ़ सकता है।
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने शुक्रवार को घोषणा की कि IRGC नौसेना के समन्वय से, 24 घंटों के भीतर दो दर्जन जहाज़ सुरक्षित रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़र गए। हालाँकि, इससे किसी को भी ज़्यादा राहत नहीं मिलेगी।
दुनिया चिंतित क्यों है?
तेल का प्रभाव केवल पेट्रोल और डीज़ल तक ही सीमित नहीं है; यह परिवहन, परिवहन, उद्योग, बिजली उत्पादन और यहाँ तक कि खाद्य पदार्थों के निर्यात को भी प्रभावित करता है। जब तेल महंगा होता है, तो लगभग हर दूसरी वस्तु की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। इसका कारण यह है कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस मुद्दे को वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा मानते हैं।
कई एशियाई देश इस स्थिति के प्रति विशेष रूप से प्रेरित हो सकते हैं, क्योंकि उनकी ऊर्जा बर्बादी का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से होने वाली आपूर्ति द्वारा ही पूरा किया जाता है। तेल आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों पर आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकती है।
भारत की स्थिति क्या है?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, जो अपने कच्चे तेल की बर्बादी का सबसे बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक से लेता है। परिणामस्वरूप, पश्चिम एशिया में उत्पन्न होने वाले किसी भी संकट का भारतीय उद्योग पर सीधा प्रभाव पड़ता है। तेल की नासिक में उथल-पुथल ने सरकार, उद्योग जगत और आम निवेशकों के बीच चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेष चिंता का विषय यह भी है कि भारत में आने वाले तेल और गैस का एक बड़ा हिस्सा ‘होरमुज़ जलडमरूमध्य’ से संबंधित है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक अवरुद्ध रहता है, तो स्तर की गुणवत्ता में वृद्धि हो सकती है, जिससे जल की आपूर्ति दबाव पैड पर हो सकती है।
हालाँकि, हाल के वर्षों में भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति में काफी विविधता लाई है। अब भारत में वैकल्पिक संयंत्र, विशेष रूप से रूस से, तेल की खरीद में वृद्धि हो रही है। प्रशासन ने ऊर्जा भंडार क्षमता बढ़ाने और आपूर्ति के वैकल्पिक चैनलों की खोज को भी प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि वित्त मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय उद्योग को “सतर्क, फिर भी ब्रांड” बताया है।
इसका आम लोगों पर क्या असर हो सकता है?
यदि तेल के वैश्विक स्तर लंबे समय तक उच्च अवशेष निवास हैं, तो ईंधन, डीज़ल और खाना पकाने वाली गैस के स्तर में वृद्धि हो सकती है। इसके परिवहन लागत, खाद्य भंडार और सामान्य पदनाम में देखा जा सकता है। इसके अलावा, विभिन्न क्षेत्रों के लिए गतिशील लागत का आर्थिक विकास दर भी प्रभावित हो सकता है।
फिर भी, भारत सरकार इस स्थिति पर सक्रिय रूप से नजर रख रही है, और वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी गंभीर ऊर्जा संकट का कोई खतरा नहीं है। हालाँकि, यदि पश्चिम एशिया में तनाव फिर से बढ़ गया है, तो वैश्विक बाजारों में और अधिक प्रदर्शनी में देखने को मिल सकता है।
निष्कर्ष
ईरान-सार्वजनिक आक्रमण अब केवल एक समूह राजनीतिक या सैन्य आक्रमण नहीं रह गया है। इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और दुनिया भर के आम लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। भारत की प्राथमिकता-निर्भर उद्योगों के लिए यह एक महत्वपूर्ण दौर है। ऊर्जा संसाधनों में विविधता लाना, प्रमुख भंडार बनाए रखना और वैकल्पिक जलाशयों की दिशा में कदम बढ़ाना भारत को भविष्य में ऐसे संकटों से बचाने में मदद कर सकता है। अवलोकन, दुनिया का ध्यान पश्चिम एशिया पर केंद्रित है, क्योंकि अगले कुछ महीनों में वहां होने वाली घटनाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर सकती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस गतिरोध का खामियाजा तेल बाजार को भुगतना पड़ रहा है। विश्व का लगभग 20% समुद्री तेल व्यापार होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यदि इस महत्वपूर्ण मार्ग को अवरुद्ध कर दिया गया, तो वैश्विक तेल आपूर्ति खतरे में पड़ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप संभावित रूप से तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है। इसी चिंता से प्रेरित होकर, हाल के महीनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं।
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