नई दिल्ली, 25 अगस्त। दक्षिण एशिया के लोगों की आंत में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों (गट माइक्रोबायोम) की संरचना दुनिया के अन्य हिस्सों की आबादी से अलग होती है और यह स्थानीय खान-पान, संस्कृति, भूगोल तथा जीवनशैली से प्रभावित होती है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अध्ययन के निष्कर्ष दक्षिण एशियाई आबादी के लिए माइक्रोबायोम आधारित जांच, व्यक्तिगत पोषण और बेहतर स्वास्थ्य देखभाल विकसित करने में महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध करा सकते हैं।
यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी), शिकागो विश्वविद्यालय तथा भारत, श्रीलंका और अमेरिका के अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया।
अध्ययन का उद्देश्य दक्षिण एशिया की अलग-अलग सांस्कृतिक, खान-पान और भौगोलिक परिस्थितियों में बदलती जीवनशैली का आंत के माइक्रोबायोम पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना था।
शोधकर्ताओं ने भारत और श्रीलंका के 10 सांस्कृतिक एवं भौगोलिक रूप से अलग-अलग समुदायों के 575 स्वस्थ वयस्कों के मल के नमूने एकत्र किए। इनके साथ प्रतिभागियों के खान-पान, जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी भी जुटाई गई।
शोध में पाया गया कि प्रत्येक समुदाय के आंत माइक्रोबायोम में बदलाव का अपना अलग स्वरूप था। यह स्थानीय खान-पान, संस्कृति, भूगोल और जीवनशैली से जुड़ा हुआ पाया गया।
शोधकर्ताओं ने विभिन्न समुदायों में रहने वाले ग्रामीण और शहरी लोगों के माइक्रोबायोम की भी तुलना की। इसके अलावा दक्षिण एशियाई लोगों के माइक्रोबायोम की तुलना दुनिया के अन्य हिस्सों से उपलब्ध आंकड़ों से की गई।
अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशिया में तेजी से हो रहे शहरीकरण के साथ मोटापा, मधुमेह और हृदय एवं चयापचय संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। हालांकि शहरीकरण का आंत के माइक्रोबायोम पर प्रभाव पहले से ज्ञात है, लेकिन अलग-अलग दक्षिण एशियाई समुदाय इस बदलाव के प्रति किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं, यह अब तक स्पष्ट नहीं था।
शोधकर्ताओं ने कहा कि माइक्रोबायोम से संबंधित अब तक के अधिकांश अध्ययन यूरोप और उत्तरी अमेरिका की आबादी पर केंद्रित रहे हैं। ऐसे में दक्षिण एशिया की आबादी का कम प्रतिनिधित्व रहा है, जबकि दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी इस क्षेत्र में रहती है।
बीएसआईपी के वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में ‘साउथ एशियन माइक्रोबायोम ऐरे’ (सांबर) नामक संसाधन का इस्तेमाल किया। संस्थान के प्राचीन डीएनए समूह के प्रमुख डॉ. नीरज राय के नेतृत्व में हुए इस अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में भारत और श्रीलंका के स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर नमूने और जीवनशैली से संबंधित जानकारी एकत्र की गई।
शोधकर्ताओं ने डीएनए अनुक्रमण और कंप्यूटेशनल विश्लेषण की मदद से आंत में मौजूद सूक्ष्मजीवों की विविधता का अध्ययन किया और उन्हें भूगोल, खान-पान, शहरीकरण तथा चयापचय संबंधी स्वास्थ्य से जोड़कर देखा।
अध्ययन में समुदाय-विशिष्ट माइक्रोबायोम संकेत भी सामने आए। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग आबादी में शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
यह अध्ययन ‘गट माइक्रोब्स’ नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अध्ययन के निष्कर्ष इस बात की जरूरत को रेखांकित करते हैं कि माइक्रोबायोम आधारित उपचार और स्वास्थ्य संबंधी रणनीतियां केवल पश्चिमी आबादी के आंकड़ों पर आधारित न हों, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रीय आबादी की विशिष्टताओं को ध्यान में रखकर विकसित की जाएं।
अध्ययन से तैयार किया गया ‘सांबर’ संसाधन भविष्य में दक्षिण एशिया में तेजी से बढ़ रही मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और अन्य जीवनशैली संबंधी बीमारियों पर शोध के लिए उपयोगी हो सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन भारत के स्वस्थ लोगों के आंत माइक्रोबायोम से संबंधित पहला व्यापक आधारभूत आंकड़ा उपलब्ध कराता है और भविष्य के चिकित्सा तथा विकासवादी अध्ययनों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान कर सकता है।
Follow @JansamacharNews



