नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र की सीमा पर बुधवार को आई विनाशकारी बाढ़ में मरने वालों की संख्या आज 27 अगस्त, 2026 को बढ़कर 359 हो गई है। अधिकारी हज़ारों लापता लोगों को खोजने के लिए तेज़ी से काम कर रहे हैं, जिनमें 285 भारतीय पर्यटक भी शामिल हैं।
कल आई इस बाढ़ ने नेपाल के तीन ज़िलों में भारी तबाही मचाई। नेपाल पुलिस ने बताया कि आज 93 और शव बरामद किए गए।ने हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचा दी है। अचानक आए मलबे और पानी के सैलाब ने सड़कें, पुल, मकान, बिजली परियोजनाएं और सीमा मार्ग बहा दिए। नेपाल के रासुवा, नुवाकोट, धादिंग और आसपास के इलाकों में राहत और बचाव अभियान जारी है। इस त्रासदी का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बड़ी संख्या में पर्यटकों और तीर्थयात्रियों से अब तक संपर्क नहीं हो पाया है।
नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार सैकड़ों लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल पर्यटन बोर्ड के आंकड़ों में 590 पर्यटक संपर्क से बाहर बताए गए हैं, जिनमें 476 विदेशी और 114 नेपाली हैं। विदेशी पर्यटकों में भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है। पर्यटन बोर्ड के अनुसार 177 भारतीय पर्यटक अब तक संपर्क में नहीं आए हैं।
हालांकि भारतीय नागरिकों की कुल स्थिति इससे कहीं बड़ी है। भारत के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि 288 भारतीय नागरिकों का अब तक पता नहीं चल पाया है। इनमें केवल पर्यटक ही नहीं, बल्कि तीर्थयात्री और नेपाल में काम कर रहे भारतीय भी शामिल हैं। मंत्रालय ने यह भी बताया कि चीन के तिब्बत क्षेत्र में लगभग 200 भारतीयों के फंसे होने की सूचना है। इनमें कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जिन्हें नेपाल में लापता बताया जा रहा है, इसलिए अलग-अलग आंकड़ों को सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा।
कैलाश–मानसरोवर यात्रियों पर सबसे ज्यादा असर
आपदा का केंद्र नेपाल-चीन सीमा के निकट रासुवागढ़ी और तिमुरे क्षेत्र है। यह मार्ग कैलाश-मानसरोवर जाने वाले भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। बुधवार सुबह अचानक आई बाढ़ ने सीमा तक जाने वाले रास्ते को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। अनेक तीर्थयात्री सीमा पार करने की तैयारी में थे।
नेपाल के पर्यटन अधिकारियों के अनुसार आपदा के समय करीब 390 कैलाश-मानसरोवर यात्रियों से संपर्क टूट गया था। इनमें नेपाल और भारत सहित विभिन्न देशों के यात्री शामिल थे। अनेक यात्री अलग-अलग ट्रैवल एजेंसियों के माध्यम से यात्रा कर रहे थे।
भारत के विदेश मंत्रालय ने लापता भारतीयों की स्थिति का एक विस्तृत प्रारंभिक ब्योरा भी दिया है। इनमें त्रिशूली-1 बिजली परियोजना में काम करने वाले 73 भारतीय, तमिलनाडु से कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर गए 37 और 49 लोगों के दो समूह, पश्चिम बंगाल के 32 यात्रियों का एक समूह, विभिन्न राज्यों के 61 लोग और केरल के 33 नागरिक शामिल हैं। मंत्रालय के अनुसार इन समूहों को मिलाकर 288 भारतीय नागरिकों का पता लगाया जा रहा है।
इस बीच राहत की एक खबर भी सामने आई है। तमिलनाडु के 21 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया है। उन्हें काठमांडू लाया जा रहा है और इसके बाद भारत भेजने की व्यवस्था की जाएगी।
परिवारों की बढ़ती चिंता
भारत के कई राज्यों में उन परिवारों की चिंता बढ़ गई है जिनके परिजन नेपाल की यात्रा पर गए थे। तमिलनाडु के यात्रियों के अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, केरल, ओडिशा और झारखंड से गए लोगों के बारे में भी जानकारी जुटाई जा रही है।
समस्या यह है कि बाढ़ ने दूरदराज के इलाकों में संचार व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है। मोबाइल नेटवर्क और बिजली आपूर्ति बाधित होने के कारण कई यात्रियों से सीधे संपर्क नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति के सुरक्षित होने के बावजूद उसका नाम कुछ समय तक लापता लोगों की सूची में रह सकता है। यही वजह है कि नेपाल और भारत की एजेंसियां लगातार सूची का मिलान कर रही हैं।
कर्नाटक से गए यात्रियों के परिवारों ने भी संपर्क टूटने की शिकायत की है। तमिलनाडु में कुछ परिवारों ने बताया कि उन्हें यात्रा एजेंसियों से भी तत्काल और स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। इससे आपदा की मानवीय त्रासदी और बढ़ गई है।
कैसे आई इतनी भयावह बाढ़?
प्रारंभिक रिपोर्टों में भूकंपीय गतिविधि को संभावित कारण माना गया था, लेकिन बाद के विश्लेषण में स्थिति स्पष्ट हुई। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार किसी बड़े भूकंप के बजाय हिमनदीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बर्फ, चट्टान और मलबे के खिसकने से यह विनाशकारी घटना हुई। इस मलबे ने नदी के प्रवाह को प्रभावित किया और अचानक भारी मात्रा में पानी तथा मलबा नीचे की ओर आया।
इस सैलाब ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के आसपास के क्षेत्रों को प्रभावित किया। पानी के साथ बहता मलबा इतना शक्तिशाली था कि उसने सड़कें, पुल और इमारतें तक नष्ट कर दीं।
बचाव अभियान में बड़ी चुनौती
नेपाल की सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल बचाव अभियान में जुटे हैं। हेलीकॉप्टरों की मदद से दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों को निकाला जा रहा है और राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। लेकिन क्षतिग्रस्त सड़कें और पुल बचाव कार्य में बड़ी बाधा बने हुए हैं।
कई स्थानों पर पूरे गांव और बाजार मलबे में दब गए हैं। नदी के किनारे तथा नीचे के इलाकों में शवों की तलाश भी जारी है। बचाव दलों को लगातार भूस्खलन और नए मलबे का खतरा बना हुआ है।
भारत ने बढ़ाया सहयोग
भारत सरकार ने नेपाल को हरसंभव सहायता का भरोसा दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अधिकारियों और नेपाल तथा चीन में तैनात भारतीय राजनयिकों के साथ स्थिति की समीक्षा की है। काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास नेपाल सरकार और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर भारतीय नागरिकों का पता लगाने और उन्हें सुरक्षित निकालने में जुटा है।
इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिस रास्ते से हर वर्ष हजारों पर्यटक और तीर्थयात्री नेपाल और तिब्बत की यात्रा करते हैं, वह अब अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र के रूप में सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय में बदलती जलवायु परिस्थितियां, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां भविष्य में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकती हैं।
फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता लापता लोगों का पता लगाना है। नेपाल की पहाड़ियों और नदियों के बीच चल रहा बचाव अभियान केवल एक प्राकृतिक आपदा से लड़ाई नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की तलाश भी है जो भारत और अन्य देशों में अपने प्रियजनों की सुरक्षित वापसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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