नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026। भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते की बातचीत एक बार फिर कठिन मोड़ पर पहुंच गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन दोनों पक्ष ऐसे बिंदु पर पहुंच गए हैं जहां आगे कुछ देना या लेना “बहुत, बहुत कठिन” हो सकता है। उन्होंने बातचीत की मौजूदा स्थिति को ठहराव बताया।
सीतारमण का यह बयान अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर के उस बयान के कुछ दिन बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता फिलहाल तत्काल होने वाला नहीं है। ग्रीर ने भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से हाल की बातचीत के बाद कहा था कि दोनों देशों ने समझौते में अड़चन पैदा करने वाले मुद्दों की पहचान कर ली है और उन पर काम किया जा रहा है।
भारत के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर अमेरिका भारत का सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है और वहां बेहतर बाजार पहुंच से भारतीय उद्योगों को बड़ा लाभ मिल सकता है।
दूसरी ओर भारत को कृषि, डेयरी, MSME, रोजगार देने वाले उद्योगों और घरेलू विनिर्माण के हितों की रक्षा करनी है।
अमेरिका में हुई बैठक से क्या संकेत मिले?
पीयूष गोयल की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर के साथ बातचीत हुई। दोनों पक्षों ने व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के मुद्दों पर चर्चा की। अमेरिकी पक्ष ने बातचीत को जारी रखने की बात कही, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि समझौते पर तत्काल हस्ताक्षर की स्थिति नहीं है।
इसका अर्थ यह है कि बातचीत समाप्त नहीं हुई है, लेकिन अंतिम समझौते के लिए जिन मुद्दों पर सहमति बननी बाकी है, वे दोनों देशों के लिए संवेदनशील हैं।
निर्मला सीतारमण ने क्या कहा?
सीतारमण ने कहा कि बातचीत “अभी भी जारी है”, लेकिन दोनों पक्षों के बीच आगे की रियायतों की गुंजाइश सीमित हो गई है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार संतुलन फिलहाल भारत के पक्ष में है और अमेरिका इस असंतुलन को कम करना चाहता है।
भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष पिछले वर्ष लगभग 34 अरब डॉलर रहा, जबकि 2024-25 में यह करीब 41 अरब डॉलर था। भारत द्वारा अमेरिका से ऊर्जा खरीद बढ़ाने के कारण इस अंतर में और कमी आने की उम्मीद भी जताई गई है।
सीतारमण ने टैरिफ के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चिंता जताई है। उनके अनुसार व्यापार घाटे को दूर करने के लिए टैरिफ को जिस तरह दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे व्यापार वार्ताओं की प्रकृति बदल गई है।
भारतीय अर्थशास्त्रियों की नजर में समस्या कहां है?
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर केवल सरकार और विपक्ष के राजनीतिक बयान ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। भारतीय अर्थशास्त्रियों और पूर्व नीति विशेषज्ञों ने भी इस गतिरोध के पीछे भारत की कुछ घरेलू आर्थिक कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाया है।
सुरजीत भल्ला: समस्या सिर्फ अमेरिका की नहीं
अर्थशास्त्री सुरजीत एस. भल्ला, जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अंशकालिक सदस्य और IMF के पूर्व कार्यकारी निदेशक रह चुके हैं, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। जुलाई में उन्होंने कहा था कि अमेरिका के साथ व्यापार और निवेश समझौता भारत में निजी निवेश को फिर से गति दे सकता है, रुपये को मजबूती दे सकता है और आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सकता है।
लेकिन भल्ला ने भारत की अपनी आर्थिक नीतियों की भी आलोचना की है। उनके अनुसार भारत में निजी निवेश और शुद्ध FDI कमजोर रहे हैं और निवेश के वातावरण को बेहतर बनाने के लिए आर्थिक सुधारों की जरूरत है। उन्होंने यह भी तर्क दिया है कि भारत की कुछ नीतिगत व्यवस्थाएं विदेशी निवेशकों के लिए अनिश्चितता पैदा करती हैं।
भल्ला की एक हालिया महत्वपूर्ण आलोचना भारत की Model Bilateral Investment Treaty (BIT) नीति को लेकर है। उनके अनुसार 2016 के मॉडल में विदेशी निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से पहले भारतीय अदालतों में पांच साल तक मुकदमा चलाने जैसी शर्त ने निवेशकों के लिए अनिश्चितता बढ़ाई। उन्होंने यह भी बताया कि भारत के लागू निवेश समझौतों की संख्या 2015 के 73 से घटकर 2021 तक केवल आठ रह गई थी।
भल्ला की आलोचनाओं को जोड़कर देखें तो उनकी दृष्टि में समस्या तीन स्तरों पर दिखाई देती है—
पहला—आर्थिक सुधारों की गति।
भूमि, निवेश, व्यापार और बाजार से जुड़े कुछ कठिन सुधारों में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर पर्याप्त तेजी नहीं दिखाई गई है।
दूसरा—निवेशकों के लिए नीति की निश्चितता।
यदि विदेशी निवेशक यह सुनिश्चित नहीं कर पाता कि नियम लंबे समय तक स्थिर रहेंगे, तो वह भारत में पूंजी लगाने में अधिक सावधानी बरत सकता है।
तीसरा—नौकरशाही की भूमिका।
भल्ला ने पहले भी कहा है कि भारत में आर्थिक नीतियों को अधिक बाजारोन्मुख बनाने और नौकरशाही नियंत्रण कम करने की जरूरत है। उनका तर्क है कि निजी निवेश तभी तेजी पकड़ेगा जब व्यवसायों को अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट और स्थिर वातावरण मिले।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये भल्ला के आर्थिक विचार हैं, सरकार पर कोई स्थापित तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं। जुलाई में भल्ला ने क्यों कहा था कि अमेरिकी समझौता भारत के लिए जरूरी है? भल्ला की राय का एक दूसरा पहलू भी है। जुलाई 2026 में उन्होंने कहा था कि भारत-अमेरिका व्यापार और निवेश समझौता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण विकास अवसरों में से एक हो सकता है। उनके अनुसार इससे विदेशी निवेश लौट सकता है, निजी क्षेत्र का पूंजीगत खर्च बढ़ सकता है और भारतीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है।
इसलिए उनकी स्थिति केवल अमेरिका की मांगों को स्वीकार करने की नहीं है। उनका जोर यह है कि भारत को ऐसा समझौता करना चाहिए जो व्यापार के साथ निवेश और तकनीक भी भारत में लाए।
दूसरे विशेषज्ञों की चेतावनी
दूसरी ओर, कुछ भारतीय विशेषज्ञों और पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने सरकार को यह चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका अत्यधिक रियायतें मांगता है तो केवल समझौता करने के लिए भारत को अपनी संवेदनशील अर्थव्यवस्था खोलने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
2025 में पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों के एक समूह ने सरकार को दिए ज्ञापन में कहा था कि यदि अमेरिका भारत के संवेदनशील क्षेत्रों—विशेषकर कृषि और अन्य कठिन क्षेत्रों—में असंतुलित रियायतें मांगता है तो भारत को ऐसे समझौते से बचना चाहिए। इस समूह में पूर्व कैबिनेट सचिव के.एम. चंद्रशेखर, पूर्व वाणिज्य सचिव जी.के. पिल्लई और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू सहित कई पूर्व अधिकारी शामिल थे।
इस दृष्टिकोण के अनुसार भारत की कमजोरी केवल घरेलू आर्थिक सुधारों की कमी नहीं है। बातचीत में भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह स्थायी घरेलू रियायतों के बदले अमेरिका से ऐसी अस्थायी या कभी भी बदली जा सकने वाली टैरिफ राहत स्वीकार न करे।
विशेषज्ञों की एक और बड़ी चिंता—FDI
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के समानांतर विदेशी निवेश का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
सुरजीत भल्ला ने हाल में भारत की निवेश संधियों और FDI नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें विदेशी निवेशक को नीतिगत और कानूनी निश्चितता मिले। उनके अनुसार भारत को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि आज कितना निवेश आ रहा है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि कौन-सी नीतियां भविष्य के निवेश को भारत आने से रोक सकती हैं।
यही मुद्दा अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अमेरिका केवल भारतीय बाजार में अपने उत्पादों की पहुंच नहीं चाहता; अमेरिकी कंपनियां निवेश और कारोबार के लिए नियमों की पारदर्शिता और स्थिरता भी चाहती हैं।
हाल ही में अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट ने भी भारत में विदेशी निवेशकों के सामने नियामकीय अनिश्चितता, आयात प्रबंधन संबंधी बाधाओं और कुछ क्षेत्रों में विदेशी तथा घरेलू निवेशकों के बीच अलग-अलग व्यवहार जैसी चिंताओं का उल्लेख किया है।
विशेषज्ञों की राय को मिलाकर देखें तो सवाल केवल यह नहीं है कि अमेरिका भारत पर कितना दबाव डाल रहा है। दूसरा सवाल यह भी है कि भारत की अपनी आर्थिक व्यवस्था कितनी प्रतिस्पर्धी और निवेश-अनुकूल है।
एक तरफ भारत अमेरिका से बेहतर टैरिफ और बाजार पहुंच चाहता है। दूसरी तरफ अमेरिका भारतीय बाजार में अधिक पहुंच, कृषि और औद्योगिक वस्तुओं के लिए अवसर तथा निवेश संबंधी नियमों में अधिक स्पष्टता चाहता है।
यहीं भारत की घरेलू आर्थिक नीतियां बातचीत का हिस्सा बन जाती हैं।
सुरजीत भल्ला जैसे अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत को आर्थिक सुधारों को तेज करना, निवेश का माहौल सुधारना और नौकरशाही संबंधी बाधाओं को कम करना चाहिए। वहीं कुछ पूर्व अधिकारियों और विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि सुधारों के नाम पर भारत अपने संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसी रियायत न दे, जिन्हें बाद में वापस लेना कठिन हो।
भारत के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर अमेरिका भारत का सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है और वहां बेहतर बाजार पहुंच से भारतीय उद्योगों को बड़ा लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर भारत को कृषि, डेयरी, MSME, रोजगार देने वाले उद्योगों और घरेलू विनिर्माण के हितों की रक्षा करनी है।
इसीलिए आज की स्थिति को केवल “अमेरिका ने दबाव डाला और भारत झुक रहा है” या इसके उलट “भारत ने अमेरिका को रोक दिया” जैसे सरल राजनीतिक निष्कर्षों से समझना उचित नहीं होगा।
वास्तविक सवाल यह है कि भारत किस प्रकार का समझौता स्वीकार करता है और उसके बदले उसे कितनी स्थायी बाजार पहुंच, निवेश, तकनीक और टैरिफ निश्चितता मिलती है।
6 अक्टूबर 2026 की स्थिति में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता टूटी नहीं है, लेकिन कठिन गतिरोध में है। निर्मला सीतारमण का “plateau” वाला बयान और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर का समझौता “imminent” नहीं होने का बयान एक ही तथ्य की ओर संकेत करते हैं—अंतिम समझौता अभी दूर है।
भारतीय विशेषज्ञों की राय इस बहस को एक दूसरा आयाम देती है। सुरजीत भल्ला के अनुसार भारत को अपने घरेलू निवेश और आर्थिक सुधारों की गति बढ़ानी होगी, जबकि पूर्व अधिकारियों के एक वर्ग का मानना है कि अमेरिका के साथ समझौते में भारत को संवेदनशील क्षेत्रों पर अत्यधिक रियायत देने से बचना चाहिए।
इसलिए आने वाले दिनों में असली परीक्षा केवल बातचीत की मेज पर नहीं होगी। परीक्षा यह भी होगी कि भारत अपने घरेलू आर्थिक सुधारों को कितनी तेजी से आगे बढ़ाता है और अमेरिका के साथ समझौते में ऐसी शर्तें हासिल कर पाता है या नहीं जो लंबे समय तक भारतीय निर्यातकों और निवेशकों के लिए निश्चितता दें।
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