— बृजेन्द्र रेही—
सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना श्रीमती रोशन कुमारी का सोमवार 5 अक्तूबर, 2026 को मुबई में निधन हो गया। वह 89 साल की थीं। 1940 से 60 के बीच सितारा देवी, दमयंती जोशी और रोशन कुमारी प्रमुख कथक नृत्यांगनाओं में जानी जाती थीं। वे अपने समय की सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा थीं। उनके जाने के बाद महसूस होता है कि हमने अपने ही सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय खो दिया।
रोशन कुमारी का जन्म 24 दिसंबर 1937 को अम्बाला में हुआ था और 5 अक्तूबर 2026 को मुंबई में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ कथक की उस पीढ़ी का एक और महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया, जिसने स्वतंत्रता के बाद भारतीय शास्त्रीय नृत्य को आधुनिक भारत के सांस्कृतिक जीवन में प्रतिष्ठित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
विडंबना यह है कि जिस रोशन कुमारी के नृत्य की चमक कभी मंचों और फिल्मों में दिखाई देती थी, वे जीवन के अंतिम वर्षों में लगभग गुमनामी में चली गई थीं।
‘इंडियन एक्सप्रेस ‘ ने 2022 में उनके साथ एक दुर्लभ बातचीत प्रकाशित की थी। उस समय वे दशकों से सार्वजनिक जीवन से लगभग दूर थीं। उसी लेख में उन्हें सितारा देवी और दमयंती जोशी के साथ कथक की एक महत्वपूर्ण त्रयी का हिस्सा बताया गया था।
आज उनके निधन पर उन्हें याद करना इसलिए जरूरी है कि नई पीढ़ी यह जान सके कि रोशन कुमारी कौन थीं?
संगीत के घर से निकलीं रोशन कुमारी
रोशन कुमारी का जन्म संगीत और लय से भरे परिवार में हुआ था। उनकी मां प्रसिद्ध गायिका जोहराबाई अम्बालेवाली थीं और पिता चौधरी फकीर मोहम्मद पखावज और तबले के जाने-माने कलाकार।
उन्होंने कथक की शिक्षा के एस मोरे से प्रारंभ की और बाद में गुलाम हुसैन खान, हनुमान प्रसाद तथा जयपुर घराने के महान गुरु सुंदर प्रसाद से प्रशिक्षण लिया। उन्हें जयपुर घराने की कथक नृत्यांगना के रूप में दर्ज किया गया है।
यही प्रशिक्षण आगे चलकर उनकी कला की पहचान बना—तेज और जटिल पद-संचालन, लय पर असाधारण पकड़, चक्कर, परन, तोड़े और भाव की अभिव्यक्ति। उनके नृत्य में तकनीक थी, लेकिन केवल तकनीक नहीं थी, उसमें एक विशेष ठहराव और गरिमा भी थी।
केवल नृत्यांगना नहीं, अपने समय की बड़ी कलाकार
आज जब हम रोशन कुमारी को याद करते हैं तो शायद सबसे पहले सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘‘जलसाघर’’ (1958) का वह अद्भुत नृत्य दृश्य सामने आता है। लेकिन फ़िल्म ‘‘जलसाघर” तक पहुँचने से पहले ही वे एक स्थापित नृत्यांगना थीं। 1950 के दशक में उन्होंने परिणीता, वारिस, मिर्ज़ा ग़ालिब और बसंत बहार जैसी फिल्मों में नृत्य प्रस्तुत किया। बिमल रॉय की ‘परिणीता’ में नृत्य निर्देशन गोपी कृष्ण ने किया था और पर्दे पर दोनों ने साथ-साथ नृत्य प्रस्तुत किए।
फिल्मों में उनकी उपस्थिति का उद्देश्य अभिनय की मुख्यधारा में आना नहीं था। वे मूलतः कथक नृत्यांगना थीं और उनकी पहचान कथक नृत्य से ही बनी।
‘जलसाघर’ और नौ मिनट का अमर नृत्य
सत्यजीत रे की ‘जलसाघर’ में रोशन कुमारी का लगभग नौ मिनट का नृत्य भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अलग स्थान रखता है।
जब रे को फिल्म के लिए असाधारण कथक नृत्यांगना की तलाश थी, तब संगीतकार उस्ताद विलायत खान ने उन्हें रोशन कुमारी का नाम सुझाया। उस समय रोशन कुमारी केवल 19 वर्ष की थीं।
उन्होंने जयपुर घराने की चतुरंग रचना पर नृत्य किया। तोड़े, टुकड़े, परन, गत-भाव और तीव्र पद-संचालन के बीच उनकी प्रस्तुति में जो नियंत्रण था, वह अद्भुत था।
और सत्यजीत रे ने उस नृत्य को जिस तरह फिल्माया, उसने उसे और भी ऐतिहासिक बना दिया। दर्पण के सामने नृत्य करती रोशन कुमारी और दर्पण में दिखाई देती उनकी गतियाँ—यह केवल नृत्य का फिल्मांकन नहीं था। रे ने उसे पूरी फिल्म के अर्थ और वातावरण से जोड़ दिया था। आज भी जलसाघर’ का वह दृश्य भारतीय सिनेमा में शास्त्रीय नृत्य के सबसे यादगार दृश्यों में गिना जाता है।
मेरी रोशन कुमारी से मुलाकात
रोशन कुमारी को याद करते हुए मेरे लिए एक व्यक्तिगत स्मृति भी बहुत महत्वपूर्ण है। 1980 के दशक में दिल्ली में कथक केंद्र के समारोहों के दौरान मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स और सांध्य टाइम्स में नृत्य पर लिखा करता था। इसलिए दिल्ली में होने वाले शास्त्रीय नृत्य के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को देखना, कलाकारों से मिलना और उनके बारे में लिखना मेरी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
उन दिनों कथक केंद्र के समारोहों की अपनी अलग प्रतिष्ठा थी। आज से तुलना करें तो उस समय दिल्ली का सांस्कृतिक वातावरण अलग था। बड़े शास्त्रीय नृत्य समारोह अपने आप में घटनाएँ होते थे। देश के प्रसिद्ध कलाकार उनमें भाग लेने आते थे। सभागार में संगीत और नृत्य के गंभीर रसिक बैठते थे और पत्रकारों के लिए भी ये कार्यक्रम महत्वपूर्ण होते थे।
मैंने उसी दौर में रोशन कुमारी को देखा और उनसे मिला। उस समय शायद यह अंदाजा नहीं था कि वर्षों बाद उन्हीं कलाकारों की स्मृतियाँ हमारे सांस्कृतिक इतिहास के दस्तावेज बन जाएँगी।
कलाकार मंच पर नृत्य करते थे और हम उनके माध्यम से भारतीय कला की परंपरा को समझते थे। रोशन कुमारी उसी परंपरा की एक बड़ी प्रतिनिधि थीं।
पुरस्कार मिले, लेकिन कलाकार की महानता पुरस्कार से नहीं मापी जाती
रोशन कुमारी को राष्ट्रीय और अन्य सम्मान मिले। संगीत नाटक अकादमी के रिकॉर्ड में उनका कथक पुरस्कार 1975 में दर्ज है और उन्हें 1984 में पद्मश्री मिला.लेकिन यहां एक बात साफ करना आवश्यक है।
पुरस्कार कलाकारों की वरिष्ठता की सूची नहीं होते। किसी कलाकार को कोई पुरस्कार पहले मिल गया और दूसरे को बाद में—इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पहला कलाकार दूसरे से अधिक बड़ा था। पुरस्कारों की अपनी चयन-प्रक्रियाएँ होती हैं और उनमें अनेक संस्थागत तथा अन्य परिस्थितियाँ काम करती हैं। इसलिए रोशन कुमारी का मूल्यांकन केवल इस आधार पर करना कि उन्हें कौन-सा पुरस्कार कब मिला, उनके योगदान को छोटा करना होगा।
सवाल इससे बड़ा है। क्या हमारे राष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थानों ने उनकी पूरी कलात्मक विरासत को पर्याप्त रूप से दर्ज और संरक्षित किया? क्या उनके नृत्य की पर्याप्त रिकॉर्डिंग उपलब्ध है? क्या उनकी रचनाएँ, उनकी शैली, उनकी शिक्षण पद्धति और उनके अनुभव व्यवस्थित रूप से संग्रहित किए गए? क्या आज का युवा कथक विद्यार्थी उन्हें उसी विस्तार से जानता है जिसके वे अधिकारी हैं? ये प्रश्न केवल रोशन कुमारी के बारे में नहीं हैं। ये हमारी सांस्कृतिक स्मृति के बारे में हैं।
एक संस्था बनाई, शिष्य तैयार किए
रोशन कुमारी ने केवल स्वयं नृत्य नहीं किया। उन्होंने आगे की पीढ़ी को तैयार करने का काम भी किया।
1971 में उन्होंने बांद्रा, मुंबई में नृत्य कला केंद्र की स्थापना की और वहां कथक की शिक्षा दी।
उनकी शिष्या मुक्ता जोशी ने भी उनकी कला और व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से लिखा है और उन्हें देश की अग्रणी कथक नृत्यांगनाओं में माना है। किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यही होती है कि उसके जाने के बाद भी उसकी कला दूसरे कलाकारों के माध्यम से जीवित रहे। रोशन कुमारी ने यह काम किया।
अंतिम वर्षों की गुमनामी
उनके जीवन का अंतिम दौर सबसे अधिक मार्मिक है। 2022 के Indian Express के साक्षात्कार में वे सार्वजनिक जीवन से काफी दूर हो चुकी थीं। उनके घर में उनके पद्मश्री सहित कई सम्मान और पुराने फोटो मौजूद थे, लेकिन उनके जीवन में मंच की वह चकाचौंध नहीं रह गई थी जो कभी उनके चारों ओर हुआ करती थी।
उनके पिता फकीर मोहम्मद उनके जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण थे। 1994 में पिता के निधन के बाद उन्होंने घुंघरू तक नहीं छुए—यह बात उन्होंने स्वयं उस बातचीत में बताई थी।
सोचिए—जिस कलाकार के पैरों की थाप ने हजारों दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, उसके घुंघरू वर्षों तक शांत रहे। यह केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है। यह समय के बदल जाने की कहानी भी है।
क्या हमने उन्हें पर्याप्त याद रखा?
रोशन कुमारी को सम्मान मिला, पद्मश्री मिला, संगीत नाटक अकादमी का सम्मान मिला, फिल्मों में अमर दृश्य मिला, शिष्य मिले और एक संस्था की विरासत मिली। फिर भी यह सवाल अपनी जगह है कि क्या उनकी प्रतिष्ठा और उनके योगदान के अनुपात में उनकी स्मृति सार्वजनिक जीवन में बनी रही?
क्यों ऐसा हुआ कि फ़िल्म ‘जलसाघर’ का वह अद्भुत नृत्य आज भी फिल्म अध्येताओं को याद है, लेकिन उस नृत्यांगना का नाम सामान्य दर्शक धीरे-धीरे भूलता गया? क्यों ऐसी महान कलाकारों की जीवित स्मृतियों को उनके जीवनकाल में रिकॉर्ड करने का प्रयास पर्याप्त नहीं होता? और क्यों हमारे सांस्कृतिक इतिहास में कई कलाकार पुरस्कार मिलने के बाद भी धीरे-धीरे हाशिए पर चले जाते हैं?
इन सवालों का उत्तर केवल सरकार से मांगना पर्याप्त नहीं होगा। सांस्कृतिक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, प्रसार माध्यमों, फिल्म अभिलेखागारों और हम पत्रकारों—सभी की इसमें जिम्मेदारी है।
रोशन कुमारी की सबसे बड़ी पहचान
उनकी सबसे बड़ी पहचान पद्मश्री नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी पहचान कोई सरकारी प्रशस्ति-पत्र नहीं था। उनकी सबसे बड़ी पहचान थी—उनका नृत्य। जयपुर घराने की वह शक्ति, वह लय, वह पद-संचालन, वह चक्कर, वह भाव और वह अनुशासन, जिसे उन्होंने अपने जीवन से साधा। और फिर वह नौ मिनट का नृत्य, जिसे सत्यजीत रे ने फ़िल्म जलसाघर’ में हमेशा के लिए कैमरे में कैद कर दिया।
आज यदि कोई रोशन कुमारी को जानना चाहता है तो उसे केवल उनके पुरस्कारों की सूची नहीं पढ़नी चाहिए। उसे उनका नृत्य देखना चाहिए। जो आज भी सिनेमा के पपर्दे पर मौजूद हैं, भलें ही वे शास्त्रीय प्रस्तुतियाँ न हों लेकिन नृत्य के विकास मार्ग पर मील के पत्थर तो हैं हीं।
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