काठमांडू/नई दिल्ली, 30 अगस्त। हिमालयी क्षेत्र में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के पांच दिन बाद भी नेपाल और तिब्बत में तबाही का मंजर खत्म नहीं हुआ है। रविवार तक दोनों ओर मृतकों की संख्या करीब 800 पहुंच गई, जबकि 3,000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि इस त्रासदी के बाद नेपाल में अब तक 149 भारतीय नागरिकों को बचाया गया है। एक सोशल मीडिया पोस्ट में, जायसवाल ने कहा कि लगभग 50 भारतीय नागरिकों से संपर्क फिर से स्थापित हो गया है जिनसे पहले संपर्क नहीं हो पा रहा था। विदेश मंत्रालय ने कहा कि 275 भारतीय नागरिकों के लापता होने की खबर है और भारतीय मूल के लगभग 128 लोग, जिनके पास दूसरी राष्ट्रीयता है, वे भी लापता हैं।
भारत लगातार बाढ़ प्रभावित हिमालयी देश में राहत और बचाव कार्यों में मदद कर रहा है। भारत ने बाढ़ प्रभावित नेपाल को 68.5 टन राहत सामग्री दी है और खोज और बचाव कार्यों में मदद के लिए तकनीकी टीमें, फोरेंसिक विशेषज्ञ और उपकरण भेजे हैं। आज 11 टन राहत सामग्री लेकर चौथी उड़ान नेपाल पहुंची।राहत और बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दुर्गम पहाड़ी इलाकों तक पहुंचना और सुरंगों में फंसे लोगों को बाहर निकालना है।
नेपाल के अधिकारियों के अनुसार रविवार तक देश में 734 शव बरामद किए जा चुके थे और करीब 2,498 लोग लापता थे। 8,186 से अधिक लोगों को बचाया जा चुका है। सरकार ने करीब 19,000 सुरक्षाकर्मियों और 16 हेलीकॉप्टरों को राहत एवं बचाव अभियान में लगाया है। अधिकारियों ने हालांकि चेताया है कि आंकड़े लगातार बदल रहे हैं और लापता लोगों की पहचान तथा सत्यापन का काम जारी है।
सुरंगों में जिंदगी की तलाश
सबसे भावुक और चुनौतीपूर्ण अभियान जलविद्युत परियोजनाओं की उन सुरंगों में चल रहा है, जहां बड़ी संख्या में कर्मचारी फंसे होने की आशंका है। बचाव दल मलबे के बीच सुरंगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। एक सुरंग में संभावित रूप से फंसे लोगों तक हवा पहुंचाने के लिए पाइप डालने की कोशिश भी की गई है। भारत, चीन और दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञ दल नेपाल पहुंचकर सुरंग बचाव अभियान में सहयोग कर रहे हैं। नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत से 11 और चीन से नौ विशेषज्ञ इस अभियान में लगाए गए हैं।
नेपाल में शवों की पहचान के लिए भारत के 18 फॉरेंसिक विशेषज्ञों की टीम भी पहुंची है, जो डीएनए विश्लेषण में सहायता कर रही है।
बचाव अभियान के बीच एक नई चिंता ने प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। रविवार को भोटेकोशी नदी का जलस्तर फिर बढ़ने के बाद नेपाल के कई प्रभावित इलाकों में नए सिरे से बाढ़ की चेतावनी जारी की गई। लोगों को मोबाइल संदेशों के जरिये सतर्क रहने और जरूरत पड़ने पर ऊंचे स्थानों पर जाने को कहा गया।
तिब्बत की ओर भूस्खलन के कारण एक नया झीलनुमा जलाशय बनने की खबर ने भी चिंता बढ़ाई। आशंका थी कि यदि जमा पानी अचानक बाहर निकलता है तो नेपाल की ओर एक और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। इसी खतरे के कारण बचाव अभियानों को कई बार रोकना पड़ा। बाद में पानी का स्तर नियंत्रित होने पर अभियान फिर शुरू किया गया।
यह आपदा केवल नेपाल और चीन तक सीमित मानवीय त्रासदी नहीं रह गई है। तिब्बत की ओर 23 देशों के 261 विदेशी नागरिकों के लापता होने की सूचना है। इनमें 104 नेपाली, 49 भारतीय, 33 लातवियाई, 18 अमेरिकी और 15 ब्रिटिश नागरिक शामिल हैं। नेपाल की ओर भी बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लापता होने की सूचना है।
ब्रिटेन के Sky News ने रविवार को कम से कम 48 ब्रिटिश नागरिकों के लापता होने की जानकारी देते हुए उन परिवारों की बेचैनी को प्रमुखता दी, जो अपने परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने भी अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है।
बाढ़ ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के आसपास व्यापक विनाश किया है। पूरे गांव मलबे में बदल गए हैं। सड़कें और पुल बह जाने से कई इलाकों का संपर्क टूट गया है। बचावकर्मी कई जगहों पर भारी मशीनों के साथ-साथ हाथों से भी मलबा हटाकर जीवित लोगों और शवों की तलाश कर रहे हैं। हेलीकॉप्टरों से दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों को निकाला जा रहा है।
चितवन में बड़ी संख्या में शव बरामद होने के बाद उन्हें रखने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं बचा। कुछ अज्ञात शवों को अस्थायी रूप से दफनाना पड़ा है। अधिकारियों का कहना है कि शवों के डीएनए नमूने और पहचान संबंधी विवरण सुरक्षित रखे जा रहे हैं ताकि बाद में परिवारों को शव सौंपे जा सकें। इस कदम को लेकर नेपाल में धार्मिक और सामाजिक स्तर पर बहस भी शुरू हुई है, क्योंकि हिंदू परंपरा में सामान्यतः अंतिम संस्कार के लिए शवों का दाह संस्कार किया जाता है।
आपदा के कारणों को लेकर वैज्ञानिकों और अधिकारियों का ध्यान हिमालय में तेजी से बदलते पर्यावरण की ओर भी गया है। प्रारंभिक आकलनों के अनुसार किसी ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान के अचानक टूटने से पानी, बर्फ और मलबे की विशाल धारा नीचे आई, जिसने नदी घाटियों में तबाही मचा दी। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म होते हिमालय में ग्लेशियरों और हिमनद झीलों में बदलाव ऐसी घटनाओं के जोखिम को बढ़ा सकता है।
रेड क्रॉस के प्रारंभिक आकलन के मुताबिक 90,000 से अधिक लोग इस आपदा से प्रभावित हो सकते हैं। अमेरिका ने नेपाल के लिए 3.6 करोड़ डॉलर नहीं, बल्कि 3.6 मिलियन डॉलर (36 लाख डॉलर) की आपात मानवीय सहायता की घोषणा की है, जिसमें 10,000 तक प्रभावित परिवारों के लिए तीन महीने तक आपात खाद्य सहायता शामिल है।
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