Divergent Reactions in the US and UK to Bhagwat’s New York Speech

भागवत के न्यूयॉर्क भाषण पर अमेरिका और ब्रिटेन में दो तरह की प्रतिक्रिया

नई दिल्ली, 30 अगस्त। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क में दिए गए भाषण को अमेरिका के प्रमुख मीडिया प्रतिनिधियों ने भारतवंशी समुदाय के बीच उनकी पहुंच बढ़ाने और आरएसएस की वैश्विक छवि को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में देखा है।

मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 29 अगस्त को आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में भागवत ने करीब 5,000 से ज्यादा भारतीय-अमेरिकी और विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया। उन्होंने विविधता में एकता को भारत की मूल भावना बताई हुई अमेरिकी भारतीय समुदाय से अपनी ‘कर्मभूमि’ अमेरिका के प्रति निष्ठावान रहने का आह्वान किया।

भागवत के भाषण का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उनका यह कथन रहा है कि जो व्यक्ति यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होना चाहिए, वह हिंदू नहीं रह सकता। वे धर्मों के अलग-अलग मार्ग होने के बावजूद मानवता को एक समझाते हुए विविधता को स्वीकार करने और सम्मान देने की बात कही। अमेरिकी मीडिया में इस कथन को आरएसएस प्रमुख के नए समावेशी संदेश के रूप में भी निर्देशांक किया गया।

हालांकि, भाषण से पहले और उसके आसपास अमेरिकी मीडिया कवरेज काफी आलोचनात्मक रही। रॉयटर्स ने भागवत की यात्रा को लेकर न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के विरोधों को प्रमुखता दी। ममदानी ने आरएसएस की विचारधारा को ‘बहिष्कारी’ बताते हुए कार्यक्रम का समर्थन करने से इनकार किया था। रॉयटर्स ने साथ ही यह भी बताया कि आरएसएस इन आरोपों को खारिज करता है और स्वयं को हिंदू सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है।

एसोसिएटेड प्रेस (एपी) और उसके प्रतियोगियों से वाशिंगटन पोस्ट ने भी कार्यक्रम से पहले विरोध प्रदर्शनों, अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की सिफारिशों और भारतीय-अमेरिकी समुदाय में मतभेदों को प्रमुखता दी। एपी की रिपोर्ट के अनुसार, 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों के समर्थन का आयोजकों ने दावा किया था, जबकि हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल और अन्य नागरिक अधिकार संगठनों ने कार्यक्रम का विरोध किया।

इससे स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रवासी समुदाय की प्रतिक्रिया एकरूप नहीं रही। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने भागवत के ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘विश्व एक परिवार है’ के संदेश की सराहना की। NDTV से बातचीत में अमेरिका और लंदन से आए कुछ भारतीय मूल के लोगों ने कहा कि उन्हें भाषण में दिया गया सार्वभौमिक एकता का संदेश प्रभावशाली लगा।

दूसरी ओर, आलोचक इसे आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय छवि बदलने की कोशिश के रूप में देखते हैं। AP ने अमेरिकी विशेषज्ञ बिल ड्रेक्सेल के प्रतियोगियों से लिखा कि आरएसएस के लिए यह विदेश में संवाद का एक नया अध्याय हो सकता है, क्योंकि राजनीतिक रूप से प्रभावशाली संगठन बनने के बाद उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका और छवि पर भी ध्यान देना पड़ रहा है।

अल जज़ीरा की अमेरिकी कवरेज आपसी ज़्यादा आलोचनात्मक रही। उसने सवाल उठाया कि ‘वननेस’ का संदेश वास्तव में व्यापक समावेशिता है या हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा की अंतरराष्ट्रीय बनावट बढ़ाने का प्रयास है। उसने अमेरिकी और भारतीय प्रवासी मजदूरों के विरोध को प्रमुखता दी तथा कार्यक्रम को लेकर आरएसएस से जुड़े संगठनों की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

ब्रिटेन में प्रत्यक्ष मुख्यधारा कवरेज सीमित दिखाई देती है। ब्रिटिश मीडिया की उपलब्ध रिपोर्टों में भागवत के न्यूयॉर्क भाषण से ज़्यादा आरएसएस, हिंदुत्व और भारतीय राजनीति के व्यापक संदर्भ को जगह मिली है। यह भी महत्वपूर्ण है कि भागवत की अमेरिका के बाद ब्रिटेन यात्रा प्रस्तावित है। आरएसएस ने अपनी अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा को अपनी शताब्दी वर्ष की वैश्विक संपर्क पहल का हिस्सा बताया है।

कुल मिलाकर, अमेरिकी मीडिया में भागवत के भाषण को दो अलग-अलग नजरियों से देखा गया—एक ओर ‘विविधता में एकता’, मानवता और प्रवासी भारतीयों की कर्मभूमि के प्रति जिम्मेदारी का संदेश; दूसरी ओर आरएसएस की पुरानी राजनीतिक छवि और अल्पसंख्यकों से जुड़े विवाद। इसलिए विदेश में इस भाषण की खबर केवल भाषण के बयानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आरएसएस की वैश्विक छवि और भारतीय प्रवासी समुदाय के भीतर हिंदुत्व को लेकर चल रही बहस का हिस्सा बन गई है।

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