नई दिल्ली. 24 जुलाई। एक तरफ भारत के विपक्षी दल शिक्षामंत्री के इस्तीफे मांग कर रहे हैं और संसद में तथा संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन करके सरकार पर दबाव बनाने जैसे आयोजन कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी इस मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।
किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की वास्तविक शक्ति तब सामने आती है जब उसकी प्रतिध्वनि देश की सीमाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन जाती है। पिछले दिनों में भारत में चल रहा छात्र आंदोलन कुछ इसी मोड़ पर पहुंच गया है। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी आवाज अब केवल भारतीय संसद या देश के राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लंदन, मैनचेस्टर, ग्लासगो और एडिनबर्ग की सड़कों से लेकर न्यूयॉर्क और अन्य शहरों में रहने वाले भारतीय समुदाय तथा विश्व मीडिया की चर्चाओं का विषय बन गई है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी युवा चुनौती बताया। एजेंसी के अनुसार परीक्षा-पत्र लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांगों ने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिया है। प्रधानमंत्री द्वारा फास्ट-ट्रैक अदालतों की घोषणा के बावजूद आंदोलनकारी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और व्यापक सुधारों की मांग पर कायम हैं।
Associated Press (AP) ने भी इसे भारत के हाल के वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण छात्र आंदोलनों में शामिल करते हुए लिखा कि जंतर-मंतर पर हजारों युवाओं का शांतिपूर्ण धरना अब केवल परीक्षा विवाद नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य, अवसरों और शासन में जवाबदेही की बहस का प्रतीक बन चुका है। एजेंसी ने यह भी उल्लेख किया कि आंदोलन को भारत के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भी समर्थन मिला है।
ब्रिटेन में सबसे अधिक सक्रियता देखने को मिली। लंदन स्थित इंडिया हाउस के बाहर भारतीय मूल के छात्रों, शोधार्थियों और पेशेवरों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई। ऐसे ही कार्यक्रम मैनचेस्टर, ग्लासगो और एडिनबर्ग में भी आयोजित किए गए। आयोजकों का कहना था कि वे भारत में लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के समर्थन में एकजुटता जता रहे हैं।
इन प्रदर्शनों में शामिल कई छात्रों ने कहा कि विदेश में रहने के बावजूद भारत की शिक्षा व्यवस्था से उनका भावनात्मक और पारिवारिक संबंध बना हुआ है। उनका कहना था कि लाखों भारतीय परिवार प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भर हैं, इसलिए परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता केवल भारत का नहीं बल्कि वैश्विक भारतीय समुदाय का भी मुद्दा है।
अमेरिका में भी भारतीय छात्रों और प्रवासी समुदाय के कुछ समूहों ने सोशल मीडिया अभियानों, ऑनलाइन बैठकों और छोटे स्तर के एकजुटता कार्यक्रमों के माध्यम से आंदोलन का समर्थन व्यक्त किया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह उल्लेख किया गया है कि आंदोलन की गूंज न्यूयॉर्क और लंदन तक सुनाई दी, हालांकि अमेरिका में ब्रिटेन जैसी बड़ी सार्वजनिक रैलियों की पुष्टि सभी स्थानों के लिए उपलब्ध नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की एक समान टिप्पणी यह रही कि यह आंदोलन केवल परीक्षा-पत्र लीक का मुद्दा नहीं रह गया है। The Guardian ने लिखा कि यह आंदोलन युवाओं की निराशा, रोजगार के सीमित अवसरों और शासन में जवाबदेही की मांग का व्यापक प्रतीक बनता जा रहा है। अखबार ने यह भी लिखा कि सरकार की ओर से घोषित कदमों के बावजूद आंदोलनकारी उन्हें पर्याप्त नहीं मान रहे हैं।
Reuters और AP दोनों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आंदोलन का प्रारंभिक मुद्दा शिक्षा था, लेकिन समय के साथ इसमें बेरोजगारी, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे व्यापक प्रश्न जुड़ गए हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे केवल एक छात्र आंदोलन नहीं बल्कि भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में उभरती युवा असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में देख रहा है।
इस बीच सोशल मीडिया ने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में रहने वाले अनेक भारतीयों ने वीडियो, तस्वीरें और टिप्पणियां साझा करते हुए भारत में हो रहे घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की। हालांकि विभिन्न मंचों पर विचारों में मतभेद भी स्पष्ट रहे—कुछ लोगों ने आंदोलन का समर्थन किया, जबकि कुछ ने सरकार के कदमों का बचाव किया। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा प्रवासी भारतीय समुदाय एक ही राजनीतिक दृष्टिकोण रखता है। उपलब्ध रिपोर्टें मुख्यतः उन समूहों का उल्लेख करती हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से समर्थन प्रदर्शन आयोजित किए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह महत्वपूर्ण क्षण होता है जब घरेलू घटनाएं अंतरराष्ट्रीय मीडिया की लगातार सुर्खियां बनने लगती हैं। इससे सरकारों पर पारदर्शी संवाद और संस्थागत सुधारों का दबाव बढ़ता है। भारत के संदर्भ में भी विदेशी मीडिया का ध्यान मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि सरकार आंदोलन का समाधान बातचीत और सुधारों के माध्यम से किस प्रकार करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रवासी भारतीय समुदाय पहले भी नागरिकता संशोधन कानून, किसानों के आंदोलन और अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रियाएं देता रहा है। वर्तमान छात्र आंदोलन भी उसी क्रम में देखा जा रहा है, जहां विदेशों में रहने वाले भारतीय अपने-अपने दृष्टिकोण से भारत के सार्वजनिक जीवन में रुचि और भागीदारी दिखा रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रवासी समुदाय की एक समान राजनीतिक राय है, बल्कि यह कि भारत से जुड़े प्रश्न अब वैश्विक भारतीय समाज के विमर्श का भी हिस्सा बनते जा रहे हैं।
पिछले दिनों की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन अब केवल दिल्ली का घटनाक्रम नहीं रह गया है। इसकी गूंज ब्रिटेन की सड़कों, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में चल रही चर्चाओं और विश्व की प्रमुख समाचार एजेंसियों तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच वार्ता होती है या नहीं, यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन इतना निश्चित है कि इस आंदोलन ने भारतीय युवाओं की आकांक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था पर बहस को वैश्विक स्तर पर पहुंचा दिया है।
Image courtesy: Social media
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