Serious questions raised about the Election Commission's functioning.

चुनाव आयोग के कामकाज पर बढ़े सवाल

SIR और आंतरिक मतभेदों को लेकर विवाद तेज

नई दिल्ली, 27 सितंबर 2026। भारत का चुनाव आयोग इन दिनों विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR), मतदाता सूची में बदलाव और आयोग के भीतर सामने आए मतभेदों को लेकर राजनीतिक तथा सार्वजनिक बहस के केंद्र में है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले तीन सदस्यीय आयोग के कामकाज को लेकर विपक्षी दलों, नागरिक संगठनों और विभिन्न समूहों ने सवाल उठाए हैं।

विवाद उस समय और बढ़ गया जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, SIR, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता संबंधी डेटा और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकृत प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद स्पष्ट किया कि आयोग के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग का कहना है कि व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्त की गई राय या आपत्ति को आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता और SIR सहित महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं।

दिल्ली में प्रदर्शन और विरोध

SIR और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर दिल्ली में भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं। विपक्षी दलों तथा विभिन्न नागरिक और सामाजिक संगठनों ने आयोग के समक्ष पारदर्शिता और मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठाए हैं।

जंतर-मंतर सहित दिल्ली के विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन हुए। कुछ संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी की है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, नागरिक संगठन CJP ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी थी।

देश के अन्य हिस्सों में भी विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन किए। 26 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस ने दिल्ली सहित कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रदर्शन किए और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

विश्वविद्यालय परिसरों में भी विरोध

SIR और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता के सवालों को लेकर छात्र संगठनों की गतिविधियां भी सामने आई हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में छात्र संगठनों ने प्रदर्शन और विरोध कार्यक्रम आयोजित किए हैं।

इन प्रदर्शनों में मुख्य रूप से मतदाता सूची में नामों के संशोधन, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों की रिपोर्ट

चुनाव आयोग के तीन सदस्यीय ढांचे में कथित मतभेद इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आए हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विभिन्न अवसरों पर नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नामों को हटाने और बहाल करने, SIR से जुड़े फैसलों तथा मतदाता डेटा की सुरक्षा और सॉफ्टवेयर व्यवस्था को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं। कुछ मामलों में इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त को भी भेजी गई थीं।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ डिजिटल और प्रशासनिक बदलावों को लेकर कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा था। इन रिपोर्टों ने चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।

फॉर्म-6 और नए मतदाताओं को लेकर सवाल

विवाद का एक हिस्सा फॉर्म-6 में किए गए बदलाव से भी जुड़ा है। यह फॉर्म नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होता है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, फॉर्म-6 के ऑनलाइन संस्करण में SIR से संबंधित एक घोषणा जोड़ी गई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए इसे तत्काल हटाने की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में भी SIR पर सवाल

SIR की प्रक्रिया को लेकर न्यायिक स्तर पर भी सवाल उठे हैं। दिल्ली में SIR के दौरान जारी किए गए कुछ नोटिसों में इस्तेमाल किए गए “logical discrepancies” जैसे आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है।

22 सितंबर 2026 को अदालत ने कुछ नोटिसों को लेकर प्रक्रिया पर सवाल उठाए और मतदाताओं को जवाब देने के लिए ई-मेल तथा WhatsApp जैसे माध्यमों के इस्तेमाल की संभावना पर भी चर्चा की।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

बढ़ते विवाद के बीच चुनाव आयोग ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।

26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की बैठक हुई। इसके बाद आयोग ने एक संयुक्त रुख पेश करते हुए SIR और डिजिटल व्यवस्था से जुड़े विभिन्न सवालों पर स्पष्टीकरण दिया। आयोग ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में नई डिजिटल पहलों से जुड़े फैसलों में अतिरिक्त विचार-विमर्श और जांच की व्यवस्था की जाएगी।

प्रदर्शनकारियों और विपक्ष की प्रमुख मांगें

विरोध कर रहे राजनीतिक दलों और संगठनों की मांगों में मुख्य रूप से शामिल हैं—

  • SIR की प्रक्रिया की स्वतंत्र और पारदर्शी समीक्षा या ऑडिट।
  • मतदाता सूची से हटाए गए नामों और उन्हें हटाने के कारणों के बारे में स्पष्ट जानकारी।
  • पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल करने की प्रभावी प्रक्रिया।
  • मतदाता सूची और चुनावी सॉफ्टवेयर से जुड़े निर्णयों में अधिक पारदर्शिता।
  • चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्टता।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज की स्वतंत्र जांच की मांग।

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी कुछ विपक्षी दलों और संगठनों ने उठाई है। हालांकि, यह एक राजनीतिक मांग है और चुनाव आयोग ने इस आधार पर कोई निर्णय घोषित नहीं किया है।

आगे बढ़ सकता है विवाद

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और मतदाता सूची में बदलाव का मुद्दा अब केवल राजनीतिक दलों के बीच बहस तक सीमित नहीं है। अदालतों में चल रही कार्यवाही, आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां और देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे प्रदर्शन इसे व्यापक सार्वजनिक विमर्श का विषय बना रहे हैं।

आयोग ने जहां अपने सभी अंतिम निर्णयों को सर्वसम्मत बताया है, वहीं सामने आई रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की कई लिखित आपत्तियों का उल्लेख किया गया है। यही विरोधाभास मौजूदा विवाद का प्रमुख केंद्र है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में किए गए संशोधनों और चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों पर आयोग, न्यायपालिका और राजनीतिक दलों की ओर से क्या आगे की कार्रवाई होती है।