BRICS adopted the ‘New Delhi Declaration’

BRICS ने अपनाया ‘नई दिल्ली घोषणापत्र

वैश्विक संस्थाओं में सुधार पर जोर

नई दिल्ली। भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के पहले दिन सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को स्वीकार कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिनभर चली बैठकों और विचार-विमर्श के बाद सत्र के समापन पर घोषणापत्र को अपनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे सभी सदस्य देशों ने मंजूरी दी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि घोषणापत्र BRICS देशों के साझा संकल्प को स्पष्ट दिशा देता है, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती इन संकल्पों को वास्तविक और ठोस परिणामों में बदलने की है। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों की जिम्मेदारी केवल घोषणाएं करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन्हें मिलकर उन पर अमल भी करना होगा।

पुरानी वैश्विक संस्थाओं में बदलाव जरूरी

शिखर सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार का मुद्दा प्रमुखता से उठा। प्रधानमंत्री ने कहा कि बदलती हुई दुनिया को लंबे समय से चली आ रही ऐसी संस्थागत व्यवस्थाओं के सहारे नहीं चलाया जा सकता, जो वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं हैं।

उन्होंने वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और शक्ति-संतुलन में पिछले कुछ दशकों में बड़े बदलाव आए हैं, लेकिन वैश्विक संस्थाओं की संरचना में उन बदलावों का पर्याप्त प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता।

मोदी ने कहा कि भविष्य की तकनीकों और उन्हें नियंत्रित करने वाले नियमों के निर्माण में ग्लोबल साउथ की समान भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनके अनुसार, जिन देशों और समाजों पर वैश्विक फैसलों का सीधा प्रभाव पड़ता है, उन्हें उन फैसलों को बनाने की प्रक्रिया में भी प्रभावी भूमिका मिलनी चाहिए।

‘विशेषाधिकार के पिरामिड’ को ‘साझेदारी के मंच’ में बदलने का आह्वान

अपने शुरुआती संबोधन में प्रधानमंत्री ने वैश्विक शासन व्यवस्था की मौजूदा स्थिति को ‘विशेषाधिकार के पिरामिड’ से जोड़ते हुए कहा कि दुनिया में निर्णय लेने की शक्ति अभी भी कुछ देशों और संस्थाओं के बीच अधिक केंद्रित है।

उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ वैश्विक संकटों की ‘फ्रंट रो’ में रहता है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में ‘बैक रो’ में है। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।

मोदी ने कहा कि इस ‘पिरामिड ऑफ प्रिविलेज’ को ऐसे ‘प्लेटफॉर्म ऑफ पार्टनरशिप’ में बदलना होगा, जहां प्रत्येक देश की आवाज हो, प्रत्येक सदस्य की हिस्सेदारी हो और विकास के केंद्र में मानवता हो।

इसी उद्देश्य से उन्होंने BRICS देशों के सामने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार के लिए 10 प्रस्ताव तैयार करने का सुझाव रखा। इन प्रस्तावों को अगले शिखर सम्मेलन तक एक ‘BRICS Reform Roadmap’ यानी सुधार की साझा कार्ययोजना का रूप देने की बात कही गई।

उन्होंने इस कार्ययोजना के लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों—Representation (प्रतिनिधित्व), Responsiveness (जवाबदेही/प्रतिक्रियाशीलता) और Rule-making (नियम निर्माण)—को महत्वपूर्ण बताया।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार पर जोर

प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की आवश्यकता को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और टाला नहीं जाना चाहिए।

उन्होंने प्रस्ताव दिया कि इस मुद्दे पर होने वाली बातचीत को निश्चित समय-सीमा और स्पष्ट परिणामों से जोड़ा जाना चाहिए। उनका कहना था कि वैश्विक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व को वर्तमान आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने की आवश्यकता है।

वित्तीय संस्थाओं के संदर्भ में भी उन्होंने कहा कि उनमें मतदान अधिकार, नेतृत्व के पद और नीतिगत प्राथमिकताएं आज की वैश्विक आर्थिक स्थिति के अनुरूप होनी चाहिए। जो देश वैश्विक आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, उन्हें वैश्विक आर्थिक शासन व्यवस्था को दिशा देने में भी उचित भूमिका मिलनी चाहिए।

BRICS की संस्थागत निरंतरता के लिए नया तंत्र

भारत ने BRICS की अध्यक्षता के दौरान समूह की गतिविधियों में निरंतरता बनाए रखने के लिए ‘BRICS Continuity and Implementation Mechanism’ का प्रस्ताव भी रखा।

BRICS की अध्यक्षता हर वर्ष बदलती है। ऐसे में भारत का तर्क है कि अध्यक्षता बदलने के साथ समूह की प्राथमिकताओं और चल रही पहलों की गति प्रभावित नहीं होनी चाहिए। प्रस्तावित तंत्र का उद्देश्य पिछले अध्यक्षों के दौरान शुरू की गई पहलों को आगे बढ़ाना और उनके कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि BRICS के विस्तार और बढ़ती भूमिका के साथ समूह के संस्थागत ढांचे को भी मजबूत करना जरूरी है।

नाविकों के लिए ‘इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क’ का प्रस्ताव

भारत ने BRICS देशों के बीच ‘नाविक आपातकालीन सहायता नेटवर्क’ स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा। इसके तहत संबंधित देशों के समुद्री प्राधिकरणों और राजनयिक मिशनों को आपस में जोड़ने की योजना है, ताकि समुद्र में संकट या किसी आपात स्थिति का सामना करने वाले नाविकों को समय पर सहायता मिल सके।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नाविक वैश्विक व्यापार को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन संकट के समय उन्हें अक्सर पर्याप्त सहायता नहीं मिल पाती। प्रस्तावित नेटवर्क का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों में सहायता और समन्वय को बेहतर बनाना है।

BRICS के 20 वर्ष पूरे, भारत ने व्यापक स्तर पर कार्यक्रम किए

प्रधानमंत्री ने इस वर्ष के सम्मेलन को इसलिए भी महत्वपूर्ण बताया क्योंकि BRICS अपने गठन के 20 वर्ष पूरे कर रहा है। उन्होंने कहा कि दो दशकों में समूह ने वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है और अब वह अधिक परिपक्व चरण में पहुंच चुका है।

भारत की BRICS अध्यक्षता को प्रधानमंत्री ने लोगों पर केंद्रित और मानवता को प्राथमिकता देने वाली अध्यक्षता बताया। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा।

भारत ने BRICS सहयोग को केवल सरकारी स्तर तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों से जोड़ने पर भी जोर दिया। प्रधानमंत्री के अनुसार, भारतीय अध्यक्षता के दौरान 350 से अधिक बैठकें आयोजित की गईं और देश के करीब 30 शहरों में विदेशी प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत किया गया।

‘किसी के खिलाफ नहीं’—BRICS की भूमिका पर मोदी का जोर

प्रधानमंत्री ने BRICS की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह समूह किसी देश या समूह के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि BRICS के सदस्य एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और आम सहमति के आधार पर आगे बढ़ते हैं।

उनके अनुसार, BRICS की शक्ति उसके सदस्य देशों के बीच सहयोग और साझा हितों में है। अब आवश्यकता इस बात की है कि समूह के भीतर बनी एकता और सहमति को वैश्विक स्तर पर ठोस परिणामों में बदला जाए।

उन्होंने कहा कि दुनिया में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच केवल नए घोषणापत्र जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। फैसलों और उनके वास्तविक परिणामों के बीच मौजूद अंतर को साझेदारी, सहयोग और सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से कम करना होगा।

भविष्य की तकनीक और वैश्विक नियमों में ग्लोबल साउथ की भागीदारी

शिखर सम्मेलन में भविष्य की तकनीकों और उनके नियमन का मुद्दा भी चर्चा में रहा। प्रधानमंत्री ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित नई तकनीकें दुनिया की अर्थव्यवस्था और समाज को तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में इनके लिए बनाए जाने वाले वैश्विक नियमों में विकासशील देशों की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है।

भारत का जोर इस बात पर रहा कि तकनीकी विकास और उसके नियमन की वैश्विक व्यवस्था केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। ग्लोबल साउथ के देशों को भी नियम निर्माण की प्रक्रिया में समान और सार्थक स्थान मिलना चाहिए।

दो स्मारक डाक टिकट जारी

BRICS के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के नेताओं ने दो स्मारक डाक टिकट भी जारी किए। यह आयोजन BRICS की दो दशक लंबी यात्रा और उसके बढ़ते वैश्विक महत्व को रेखांकित करने के लिए किया गया।

‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को सर्वसम्मति से स्वीकार किए जाने के साथ भारत की अध्यक्षता में आयोजित शिखर सम्मेलन का पहला दिन वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, ग्लोबल साउथ की भूमिका बढ़ाने, बहुपक्षवाद को मजबूत करने और BRICS के भीतर सहयोग को संस्थागत रूप देने के प्रयासों पर केंद्रित रहा।

घोषणापत्र के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इसके संकल्पों को व्यावहारिक कदमों और ठोस परिणामों में बदलने की होगी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने समापन संबोधन में इसी बात को रेखांकित करते हुए कहा कि घोषणाओं को जमीन पर उतारना ही BRICS देशों की साझा जिम्मेदारी है।