BRICS सम्मेलन के बीच सवाल : क्या घरेलू राजनीतिक बयानबाजी को विदेश नीति और करोड़ों भारतीयों के आर्थिक हितों से अलग रखना जरूरी नहीं?
नई दिल्ली, 11 सितंबर (जनसमाचार डेस्क)। नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन के बीच भारत की विदेश नीति का एक पुराना लेकिन महत्वपूर्ण विरोधाभास फिर चर्चा में है। एक ओर भारत चीन को अपना रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है और सीमा, सुरक्षा तथा आर्थिक निर्भरता के मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाता है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। दूसरी ओर पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों के साथ भारत के गहरे व्यापारिक, ऊर्जा, रोजगार और प्रवासी संबंध हैं, लेकिन भारत की घरेलू राजनीति में धार्मिक और सामुदायिक बयानबाजी कभी-कभी इन संबंधों के लिए कूटनीतिक कठिनाइयां पैदा कर देती है।
सवाल यह नहीं है कि किसी राजनीतिक दल को अपने विचार रखने का अधिकार होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या सत्ता और राजनीति में प्रभाव रखने वाले नेताओं को यह समझना नहीं चाहिए कि उनके शब्दों का असर भारत के व्यापार, रोजगार, प्रवासी भारतीयों और विदेश नीति पर भी पड़ सकता है?
हाल के दिनों में नेपाल हुई त्रासदी और सैंकड़ों लोगों की मौत की प्राकृतिक आपदा को लेकर भारत में कुछ मीडिया मंचों और हिंदुत्व समर्थक वर्गों ने अपनी पारंपरिक चीन-विरोधी मानसिकता के अनुरूप नेपाल की इस त्रासदी को “चीन का वाटर बम” तक करार दिया, हालांकि ऐसे दावों के समर्थन में तत्काल कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक या आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया।
चीन को लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था का विरोधाभास
भारत और चीन के संबंधों में सीमा विवाद और सुरक्षा संबंधी गंभीर मतभेद हैं। 2020 के बाद दोनों देशों के बीच विश्वास का संकट भी पैदा हुआ। इसके बावजूद चीन के साथ व्यापार बंद नहीं हुआ। बल्कि आंकड़े बताते हैं कि व्यापार बढ़ा है।
भारत सरकार के बीजिंग स्थित दूतावास के आंकड़ों के अनुसार 2020-21 में भारत ने चीन को 21.19 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया और 65.21 अरब डॉलर का आयात किया था। 2025-26 में निर्यात बढ़कर 19.47 अरब डॉलर और आयात 131.63 अरब डॉलर हो गया। परिणामस्वरूप व्यापार घाटा 44.02 अरब डॉलर से बढ़कर 112.16 अरब डॉलर हो गया। कह सकते हैं कि राजनीतिक संबंधों में तनाव के बावजूद आर्थिक संबंध समाप्त नहीं हुए। बल्कि चीन भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बन गया कि उससे पूरी तरह व्यापार तोड़ना व्यावहारिक विकल्प दिखाई नहीं देता।
आज चीन से भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, विद्युत उपकरण, औद्योगिक कल-पुर्जे, रसायन और सौर ऊर्जा से संबंधित सामान बड़ी मात्रा में खरीदता है। अनेक भारतीय उद्योगों की उत्पादन शृंखला में चीनी मशीनरी अथवा components किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं।
यही कारण है कि राजनीतिक मंच से चीन की आलोचना और सरकारी स्तर पर चीन के साथ व्यापारिक बातचीत—दोनों को अलग–अलग संदर्भों में देखना आवश्यक है।
असल में, भारत चीन के साथ निवेश, बाज़ार तक पहुँच, व्यापार घाटे और आर्थिक संबंधों जैसे मुद्दों पर रणनीतिक आर्थिक बातचीत कर रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच होने वाली प्रस्तावित बैठक में भी बाज़ार तक पहुँच और व्यापार घाटे जैसे मुद्दों पर खास तौर पर ध्यान दिए जाने की उम्मीद है।
फिर राजनीति में चीन पर केवल आक्रामक भाषा क्यों?
यह प्रश्न राजनीतिक दलों से पूछा जा सकता है कि यदि चीन के साथ आर्थिक संबंध राष्ट्रीय हित में आवश्यक हैं, तो जनता के सामने भी यह स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बताया जाना चाहिए कि—
“चीन हमारा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हो सकता है, लेकिन चीन के साथ हर प्रकार का व्यापार बंद करना भारत के आर्थिक हित में नहीं है। हमारा उद्देश्य व्यापार को अधिक संतुलित बनाना और चीन पर अनावश्यक निर्भरता कम करना है।”
ऐसी भाषा अधिक यथार्थवादी होगी।
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा हो, सुरक्षा पर दृढ़ता हो और जहां आवश्यक हो वहां प्रतिबंध हों—लेकिन व्यापारिक संबंधों को राष्ट्रीय हित के अनुसार चलाना भी उतना ही जरूरी है।
खाड़ी के मुस्लिम देशों का दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण
भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व इससे भी व्यापक है।
सऊदी अरब में लगभग 26 लाख भारतीय रह रहे हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारतीय समुदाय ने सऊदी अरब के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। UAE में भारतीय समुदाय की संख्या 35 लाख से अधिक है।
ये केवल आंकड़े नहीं हैं। इनमें इंजीनियर, डॉक्टर, तकनीशियन, निर्माण क्षेत्र के कर्मचारी, ड्राइवर, कारोबारी, IT विशेषज्ञ, प्रबंधक और अनेक अन्य पेशेवर शामिल हैं। उनकी कमाई का एक हिस्सा भारत में परिवारों को भेजा जाता है और इससे देश में विदेशी मुद्रा आती है।
RBI के अनुसार विदेशों में काम करने वाले भारतीयों से आने वाले private transfer यानी remittances भारत के बाहरी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भारत लगातार दुनिया का सबसे बड़ा remittance प्राप्तकर्ता देश बना हुआ है।
इसलिए खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों का अर्थ केवल तेल खरीदना या वहां सामान बेचना नहीं है। इसके साथ करोड़ों भारतीय परिवारों की आय और लाखों भारतीय कामगारों का भविष्य भी जुड़ा हुआ है।
2022 की घटना से क्या सबक मिला?
जून 2022 में BJP की तत्कालीन प्रवक्ता नूपुर शर्मा और BJP नेता नवीन जिंदल की पैगंबर मोहम्मद से संबंधित टिप्पणियों के बाद कई मुस्लिम देशों में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
कतर और कुवैत ने भारतीय राजदूतों को तलब किया। सऊदी अरब, UAE और अन्य देशों ने भी टिप्पणियों की निंदा की। इसके बाद BJP ने नूपुर शर्मा को निलंबित और नवीन जिंदल को निष्कासित किया तथा कहा कि पार्टी सभी धर्मों का सम्मान करती है। उस समय कुछ देशों में भारतीय उत्पादों के बहिष्कार की अपीलें भी सामने आईं।
इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण सबक यही है कि घरेलू राजनीतिक बयान और विदेश नीति हमेशा पूरी तरह अलग–अलग नहीं रहते।
आज सोशल मीडिया का एक बयान कुछ ही घंटों में दूसरे देश में पहुंच जाता है। वहां की सरकार, कारोबारी समुदाय और आम जनता उसे भारत की छवि से जोड़ सकती है।
इसलिए यह केवल धार्मिक संवेदनशीलता का प्रश्न नहीं है; यह कूटनीतिक और आर्थिक विवेक का प्रश्न भी है।
BJP और RSS के लिए क्या संदेश?
भारत में BJP एक बड़ी राजनीतिक शक्ति है और RSS उसका वैचारिक आधार है। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि इन संगठनों से जुड़े सार्वजनिक वक्ताओं को यह समझना चाहिए कि उनकी भाषा का प्रभाव केवल भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं रहता।
मुसलमानों या इस्लाम के बारे में अपमानजनक अथवा सामूहिक रूप से आरोप लगाने वाली भाषा से बचना किसी एक समुदाय को खुश करने की बात नहीं है। यह भारतीय राष्ट्रीय हित की रक्षा का प्रश्न है।
यदि किसी भारतीय नेता को किसी व्यक्ति, संगठन या नीति की आलोचना करनी है तो वह करे—लेकिन आलोचना को पूरे धर्म या पूरे समुदाय के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए।
विशेषकर उन देशों के संदर्भ में जहां लाखों भारतीय रहते और काम करते हैं, राजनीतिक नेतृत्व की भाषा में संयम और जिम्मेदारी आवश्यक है।
भारत को खाड़ी देशों से क्या चाहिए?
भारत को पश्चिम एशिया से आने वाले अवसरों को केवल तेल तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
भारत के हितों में शामिल हैं—ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा, अधिक रोजगार अवसर, भारतीय कंपनियों के लिए निवेश, खाद्य सुरक्षा, दवाइयों और इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यात, IT और डिजिटल सेवाएं तथा खाड़ी देशों के निवेश को भारत की infrastructure और manufacturing में लाना।
इसलिए भारत को UAE, सऊदी अरब और अन्य मुस्लिम देशों के साथ संबंधों में सम्मान, व्यावहारिकता और पारस्परिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।
धार्मिक सम्मान और राष्ट्रीय हित एक–दूसरे के विरोधी नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है।
भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राजनीतिक नेतृत्व को हर सार्वजनिक वक्तव्य के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव की चिंता नहीं करनी चाहिए।
इसी तरह मुस्लिम देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने का अर्थ यह नहीं है कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ दे या किसी दूसरे देश की हर नीति से सहमत हो जाए।
भारत चीन से असहमति रखते हुए भी चीन के साथ व्यापार कर सकता है।
भारत किसी मुस्लिम देश की किसी नीति से असहमत होते हुए भी उसके साथ व्यापार, ऊर्जा, रोजगार और कूटनीतिक संबंध बनाए रख सकता है।
यही परिपक्व विदेश नीति है।
BRICS के बदलते स्वरूप में इसकी जरूरत और बढ़ी
आज BRICS में चीन और रूस के साथ-साथ UAE, सऊदी अरब, ईरान, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देश भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। यानी भारत के लिए यह मंच अब एशिया, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और Global South के अनेक देशों को एक साथ जोड़ता है।
भारत स्वयं BRICS में digital payments और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को बेहतर बनाने की पहल कर रहा है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कारोबार को अधिक आसान बनाना है। (Reuters)
जब भारत एक तरफ इन देशों के साथ व्यापार और वित्तीय सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, तब घरेलू राजनीतिक भाषा में भी उसी आर्थिक और कूटनीतिक लक्ष्य के अनुरूप जिम्मेदारी दिखाई देनी चाहिए।
राजनीति का लाभ आज, राष्ट्रीय हित का नुकसान
राजनीतिक दलों के लिए किसी समुदाय या विदेशी देश के खिलाफ कठोर भाषा तत्काल राजनीतिक लाभ दे सकती है। लेकिन भारत जैसे बड़े और तेजी से बढ़ते देश के लिए विदेश नीति का पैमाना कुछ और होना चाहिए।
आज का राजनीतिक नारा यदि कल भारतीय श्रमिक के रोजगार, भारतीय व्यापारी के बाजार या भारतीय कंपनी के कारोबार के लिए समस्या पैदा करता है, तो अंततः नुकसान देश का होता है।
चीन के साथ भारत को प्रतिस्पर्धा करनी है तो करे—लेकिन व्यापार और आर्थिक हितों को भी ध्यान में रखे।
मुस्लिम देशों के साथ भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी है तो पूरी दृढ़ता से करे—लेकिन वहां रहने वाले भारतीयों, वहां से आने वाले निवेश, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार को ध्यान में रखते हुए सम्मानजनक भाषा और व्यवहार बनाए रखे।
BRICS सम्मेलन भारत के सामने एक बड़ा अवसर रखता है। भारत को दुनिया को यह दिखाना चाहिए कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि आर्थिक ताकत, कूटनीतिक संतुलन और व्यावहारिक नीतियों से आगे बढ़ाना चाहता है।
चीन के साथ व्यापार और प्रतिस्पर्धा दोनों चल सकते हैं। मुस्लिम देशों के साथ धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर व्यापार, रोजगार और मानवीय संबंध मजबूत किए जा सकते हैं।
आखिर विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य यही होना चाहिए—
भारत की सुरक्षा मजबूत हो, भारतीयों को रोजगार मिले, भारतीय कंपनियों को नए बाजार मिलें, देश में विदेशी मुद्रा आए और दुनिया में भारत के प्रति विश्वास बढ़े।
इसी कसौटी पर राजनीतिक भाषा और राजनीतिक आचरण को भी परखा जाना चाहिए।
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