G7 के 10 करोड़ बैरल तेल जारी करने के फैसले से बाजार को राहत की उम्मीद, लेकिन भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा अब भी बड़ी चुनौती
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर। दुनिया में बढ़ते तेल संकट और ईंधन की आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंता के बीच G7 देशों ने अगले चार महीनों में अपने आपात भंडार से 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल और तेल उत्पाद जारी करने का फैसला किया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) इस पूरी प्रक्रिया में समन्वय की भूमिका निभाएगी। योजना के तहत शुरुआती 20 दिनों में बड़ी मात्रा में डीजल बाजार में लाया जाएगा।
G7 का यह कदम ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े जोखिमों ने वैश्विक तेल और विशेष रूप से डीजल की आपूर्ति को प्रभावित किया है। IEA के अनुसार मार्च में घोषित सामूहिक कार्रवाई के तहत सदस्य देश अब तक लगभग 32.5 करोड़ बैरल तेल और तेल उत्पाद अपने रणनीतिक भंडार से जारी कर चुके हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और अपनी तेल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवहन लागत, उद्योग, कृषि और महंगाई पर भी पड़ता है।
G7 के भंडार से तेल जारी होने से यदि वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ती है और कीमतों पर दबाव कम होता है तो भारत के लिए यह कुछ राहत की स्थिति हो सकती है। लेकिन इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। G7 का फैसला मूलतः आपूर्ति में तत्काल दबाव कम करने के लिए है।
रूस बना हुआ है भारत के लिए महत्वपूर्ण स्रोत
भारत की वर्तमान ऊर्जा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रूस से कच्चे तेल की खरीद भी है। सितंबर में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा, हालांकि रूसी तेल की आवक घटकर लगभग 1.75 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई। इसके पीछे रूस से निर्यात में कमी, चीन की बढ़ती खरीद और समुद्री मार्गों से जुड़ी चुनौतियां प्रमुख कारण बताए गए हैं।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 3 अक्टूबर को एक संसदीय समिति की बैठक के दौरान संकेत दिया कि रूसी कच्चा तेल भारत के ऊर्जा मिश्रण का हिस्सा बना रहेगा। इससे स्पष्ट है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के मामले में किसी एक स्रोत पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय विभिन्न स्रोतों से आपूर्ति बनाए रखने की नीति पर जोर दे रहा है।
पश्चिम एशिया से फिर बढ़ी आपूर्ति
इस बीच भारत ने पश्चिम एशिया से तेल की आपूर्ति भी बढ़ाई है। सितंबर में भारत का कुल कच्चे तेल का आयात लगभग 5.26 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो 2026 में अब तक का ऊंचा स्तर बताया गया है। पश्चिम एशियाई देशों से आपूर्ति में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक तेल व्यापार का एक प्रमुख समुद्री मार्ग है। इस मार्ग में किसी भी लंबे व्यवधान की स्थिति में भारत को वैकल्पिक स्रोतों और वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।
सितंबर में भारत ने पश्चिम एशियाई तेल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए ship-to-ship transfers का भी इस्तेमाल किया। इससे पता चलता है कि भारतीय रिफाइनरियां बदलती परिस्थितियों के अनुरूप आपूर्ति के नए रास्ते तलाश रही हैं।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती
भारत के सामने इस समय चुनौती केवल तेल खरीदने की नहीं बल्कि सही कीमत पर पर्याप्त और भरोसेमंद तेल उपलब्ध कराने की है।
रूस से मिलने वाला अपेक्षाकृत सस्ता तेल यदि कम उपलब्ध होता है और उसकी जगह भारत को UAE, इराक, अंगोला या अन्य देशों से महंगा तेल खरीदना पड़ता है तो इसका असर भारतीय रिफाइनरियों की लागत पर पड़ सकता है। हाल की रिपोर्टों में अक्टूबर और नवंबर में रूसी तेल की आपूर्ति और कड़ी होने की आशंका जताई गई है।
यही कारण है कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ अब केवल रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार रखना नहीं है। इसके साथ-साथ तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, रिफाइनिंग क्षमता और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विस्तार भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।
आम भारतीय पर क्या असर पड़ेगा?
अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लगातार तेजी रहने पर इसका असर अर्थव्यवस्था में कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है। परिवहन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव विभिन्न वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है। दूसरी ओर, यदि G7 और IEA की पहल से वैश्विक आपूर्ति बढ़ती है और कीमतों में स्थिरता आती है तो भारत के आयात बिल पर दबाव कम हो सकता है।
हालांकि G7 के फैसले के बावजूद तेल बाजार की स्थिति पूरी तरह सामान्य होने की गारंटी नहीं है। IEA ने भी कहा है कि मध्य-पूर्व से कच्चे तेल का निर्यात काफी हद तक सुधरा है, लेकिन रिफाइंड उत्पादों की आपूर्ति अभी भी गंभीर दबाव में है।
भारत की रणनीति: किसी एक खेमे पर निर्भरता नहीं
वर्तमान परिस्थितियों में भारत के सामने सबसे व्यावहारिक रास्ता आपूर्ति के स्रोतों को लगातार विविध बनाए रखना दिखाई देता है। रूस से तेल, पश्चिम एशिया के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता, अफ्रीकी और अन्य स्रोत—इन सभी से उपलब्धता और कीमत के आधार पर खरीद जारी रखना भारतीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
साथ ही दीर्घकाल में भारत के लिए अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक परिवहन, घरेलू ऊर्जा उत्पादन और ऊर्जा दक्षता का विस्तार तेल आयात पर निर्भरता कम करने में भूमिका निभा सकता है।
G7 का 10 करोड़ बैरल तेल जारी करने का फैसला तत्काल दबाव कम करने का प्रयास है। भारत के लिए असली प्रश्न यह है कि दुनिया में तेल बाजार कितना स्थिर होता है और भारत कितनी कुशलता से अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध तथा सुरक्षित बनाए रखता है।
फिलहाल भारत की नीति का केंद्र यही दिखाई देता है—जहां से सुरक्षित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य तेल मिले, वहां से खरीद; किसी एक स्रोत पर निर्भरता से बचाव; और दीर्घकाल में आयातित तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिश।
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