नई दिल्ली,03 अगस्त । स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में सम्पन्न हुए 23वें राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान प्राप्त किया। 23वें राष्ट्रमंडल खेल भारत के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुए। 2026 राष्ट्रमंडल खेल 23 जुलाई 2026 से 2 अगस्त 2026 तक आयोजित किए गए।
भारतीय खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन केवल पदकों की संख्या तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने यह भी सिद्ध कर दिया कि भारत अब पारंपरिक खेलों के साथ-साथ नए खेलों और पैरा स्पर्धाओं में भी विश्व स्तर पर चुनौती देने की क्षमता रखता है।
मुक्केबाज़ी बनी भारत की सबसे बड़ी ताकत
इस बार भारतीय मुक्केबाज़ों ने इतिहास रच दिया। भारत ने मुक्केबाज़ी में कुल 10 पदक, जिनमें 7 स्वर्ण शामिल हैं, जीतकर राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। किसी एक राष्ट्र द्वारा एक ही संस्करण में मुक्केबाज़ी में इतनी बड़ी सफलता अभूतपूर्व मानी जा रही है।
साक्षी, जैसमीन लांबोरिया, मिनाक्षी, हर्ष चौधरी, अभिषेक और अन्य युवा मुक्केबाज़ों ने जिस आत्मविश्वास के साथ मुकाबले जीते, उससे स्पष्ट है कि भारतीय मुक्केबाज़ी अब केवल कुछ नामों पर निर्भर नहीं रह गई है। देश के पास प्रतिभाओं की मजबूत नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है।
मीराबाई चानू : अनुभव का स्वर्णिम अध्याय
भारोत्तोलन में मीराबाई चानू ने फिर साबित किया कि वे भारतीय खेलों की सबसे विश्वसनीय खिलाड़ियों में से एक हैं। उन्होंने अपना तीसरा लगातार राष्ट्रमंडल स्वर्ण जीतकर इतिहास रच दिया। वर्षों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर प्रदर्शन करने वाली मीराबाई नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।
जूडो में पहली बार सुनहरा इतिहास
भारत ने जूडो में भी नई उपलब्धि हासिल की। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण पदक जीतकर राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय जूडो का नया अध्याय लिखा। इससे पहले इस खेल में भारत को ऐसी सफलता नहीं मिली थी। यह उपलब्धि बताती है कि अब भारत उन खेलों में भी आगे बढ़ रहा है जहाँ पहले उसकी उपस्थिति सीमित मानी जाती थी।
एथलेटिक्स में निरंतरता
ट्रैक और फील्ड प्रतियोगिताओं में भी भारतीय खिलाड़ियों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। लंबी दूरी की दौड़ में गुलवीर सिंह दो पदक जीतने वाले भारत के एकमात्र खिलाड़ी बने। उन्होंने यह साबित किया कि भारतीय एथलेटिक्स अब केवल भाला फेंक या कुछ चुनिंदा स्पर्धाओं तक सीमित नहीं है।
पैरा खिलाड़ियों ने बदली सोच
यदि इस राष्ट्रमंडल खेल का सबसे प्रेरक अध्याय कोई रहा तो वह भारतीय पैरा खिलाड़ियों का प्रदर्शन था। भारत ने पहली बार पैरा स्पर्धाओं में 7 पदक (3 स्वर्ण, 2 रजत, 2 कांस्य) जीतकर नया इतिहास बनाया। यह उपलब्धि केवल पदकों की नहीं, बल्कि खेलों में समावेशी दृष्टिकोण और बेहतर प्रशिक्षण व्यवस्था का प्रमाण भी है।
किन खिलाड़ियों ने सबसे अधिक प्रभावित किया?
इन खेलों में कई खिलाड़ियों ने भविष्य के सितारे होने का संकेत दिया—
मीराबाई चानू – निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन।
गुलवीर सिंह – दो पदक जीतकर विशेष पहचान।
साक्षी – मुक्केबाज़ी में स्वर्ण।
जैसमीन लांबोरिया – स्वर्ण और भविष्य की बड़ी उम्मीद।
अस्मिता डे – जूडो में ऐतिहासिक स्वर्ण।
हर्ष सिंह – जूडो में नई पहचान।
भारतीय पैरा एथलीटों का सामूहिक प्रदर्शन।
इन खिलाड़ियों ने दिखाया कि भारत के पास केवल अनुभवी चैंपियन ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी का मजबूत आधार भी तैयार है।
सीमित खेलों में भी शानदार प्रदर्शन
ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल 2026 का आयोजन पहले की तुलना में छोटे पैमाने पर हुआ। हॉकी, क्रिकेट, कुश्ती, बैडमिंटन और टेबल टेनिस जैसे कई खेल इस संस्करण में शामिल नहीं थे। यदि ये खेल भी कार्यक्रम का हिस्सा होते, तो भारत का पदक प्रदर्शन और बेहतर हो सकता था।
अहमदाबाद 2030 की तैयारी का संकेत
राष्ट्रमंडल खेलों के समापन समारोह में आधिकारिक रूप से 2030 खेलों की मेज़बानी भारत को सौंपी गई। भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पी. टी. ऊषा और ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा ने राष्ट्रमंडल ध्वज ग्रहण किया। अब दुनिया की निगाहें अहमदाबाद 2030 पर होंगी।
आगे की चुनौतियाँ
हालाँकि भारत का प्रदर्शन उत्साहवर्धक रहा, लेकिन खेल विशेषज्ञों का मानना है कि अब अगली चुनौती इस सफलता को ओलंपिक स्तर तक ले जाने की है। खिलाड़ियों के लिए आधुनिक प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, मानसिक तैयारी, पोषण और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का नियमित अनुभव आवश्यक होगा।
ग्लास्गो 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल कुछ चुनिंदा खेलों का देश नहीं रहा। मुक्केबाज़ी में विश्वस्तरीय प्रभुत्व, जूडो में नई शुरुआत, पैरा खिलाड़ियों का ऐतिहासिक प्रदर्शन और एथलेटिक्स में उभरती प्रतिभाएँ इस बात का संकेत हैं कि भारतीय खेल एक नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं।
अब जब 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी भारत के हाथ में है, तो यह सफलता केवल पदकों की कहानी नहीं, बल्कि उस भविष्य की प्रस्तावना है जहाँ भारतीय खिलाड़ी अपने ही देश में विश्व मंच पर इतिहास रचने का प्रयास करेंगे।
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